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मिलना भूल गई

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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उहापोह में बैठी हूँ मैं, क्या लिखना है भूल गयी।
ऐसे डूब गई भावों में, सबसे मिलना भूल गयी॥

प्यार किया था कभी किसी से वो पल जाने कहांँ गये,
खोई कोई-सी रहती हूँ ढूँढ रही आयाम नये।
बीते पल की मधुर स्मृतियाँ बहुत मुझे तड़पाती है,
नयन छलक जाते मेरे, जब उनकी याद सताती है।
ख़ामोशी ने पहरा डाला, आज चहकना भूल गयी,
ऐसे डूब गई भावों में, सबसे मिलना भूल गयी…॥

विरहाग्नि से व्यथित हृदय है, सुध-बुध भूल गयी सारी,
जैसे चंदा बिना चकोरी रैन बिताए दुखियारी।
काँप रहे कर कलम धरे, अन्तर्मन मेरा घबराए,
स्याही बने आँख के आँसू लेकिन लिखा नहीं जाए।
जीवन के कोरे सफ़हों पर कलम चलाना भूल गयी,
ऐसे डूब गई भावों में, सबसे मिलना भूल गयी…॥

बस अतीत-सी बनी आज ये मेरी प्रेम कहानी भी,
मन में दबी हुई इच्छाएँ मुझे सफ़ों पर लानी थी।
युगों-युगों की प्रीति भुला दी, ऐसे निष्ठुर हरजाई,
क्या कुसूर था मेरा, मुझको कुछ भी समझ नहीं आई।
छोड़ दिया सब कुछ ईश्वर पर, गया जमाना भूल गयी,
ऐसे डूब गई भावों में, सबसे मिलना भूल गयी…॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है