साहित्य अकादमी मप्र के निदेशक डॉ. विकास दवे से मुम्बई की पीएच-डी. शोध निदेशक डॉ. पूजा अलापुरिया की लघुकथा शोध अध्येता सोनम तिवारी की खुली बातचीत |
◾सोनम- आपका साहित्यिक सफ़र कैसे शुरू हुआ ? क्या कोई खास घटना या प्रेरणा थी, जिसने आपको अपने क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया ?
🔹डॉ. दवे- सोनम!! सबसे पहले तो अपनी साक्षात्कार श्रृंखला का हिस्सा बनाने के लिए आपको बहुत सारा धन्यवाद। प्रथम प्रश्न आपने किया है मेरी साहित्य की यात्रा को लेकर। मेरा यह दृढ़ मत है कि ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति का जीवन लक्ष्य तय करके रखता है। ईश्वर ही वह व्यवस्था बना कर रखते हैं, कि व्यक्ति को अपने जीवन काल में कहाँ पहुंचना है ? हमें ईश्वरीय सत्ता से इस तरह के संकेत भी मिलना प्रारंभ हो जाते हैं। कई बार दुर्भाग्य से हम अपने लक्ष्य से बाएं-दाएं होते भी हैं तो ईश्वर हमें अपनी मंज़िल की ओर खींच कर ले जाते हैं। इसी बात को महर्षि अरविंद ने यह भी कहा है कि -“आपकी डेस्टीनी आपको पुकारती है और अपनी ओर खींच कर ले आती है।”
मैं भी उच्च गणित का विद्यार्थी था, विज्ञान पढ़ते हुए इलेक्ट्रिकल से डिप्लोमा भी किया। मध्य प्रदेश विद्युत मंडल में १ वर्ष सेवाएं भी दी किंतु साहित्य के क्षेत्र ने मुझे अपनी ओर आकर्षित करना बंद नहीं किया। यह आकर्षण बाल्यकाल में कक्षा ६ से एक वाचनालय की पुस्तकें पढ़ने से प्रारंभ हुआ था। बाद में मैंने शैक्षणिक दृष्टि से भी स्नातकोत्तर हिंदी साहित्य से किया और तत्पश्चात एम.फिल. और पीएच.-डी. भी बाल साहित्य और बाल पत्रकारिता के विषयों पर सम्पन्न की। मुझे मानद डी. लिट. की उपाधि भी बाल मनोविज्ञान पर अपने कार्य के लिए प्राप्त हुई। इस प्रकार जीवन में साहित्य ने न केवल प्रवेश किया, बल्कि वह मेरे जीवन का अभिन्न अंग बनकर रह गया।
◾सोनम- आपकी सबसे पसंदीदा रचना या परियोजना कौन-सी है और क्यों ?
🔹डॉ. दवे- सोनम!! परियोजनाओं की चर्चा तो बहुत लंबी हो जाएगी, क्योंकि मैं अपने जीवन के लगभग ४ दशक सार्वजनिक जीवन में बिता चुका हूँ इसलिए उस पर चर्चा अभी नहीं करूंगा। अभी केवल रचना की बात कर रहा हूँ। उपन्यास में मुझे कन्नड़ उपन्यासकार भेरप्पा का उपन्यास ‘आवरण’ अत्यधिक प्रिय है। इसी विधा का ‘व्यास गादी’ उपन्यास जो मध्य प्रदेश के प्रख्यात रचनाकार अशोक जामनानी द्वारा लिखा गया है, वह मुझे बहुत पसंद है। वाराणसी की प्रसिद्ध रचनाकार नीरजा माधव का उपन्यास ‘गेशे जाम्पा’, जो तिब्बती शरणार्थियों की समस्या पर केंद्रित है वह भी मुझे अत्यंत प्रिय है। यूँ तो ‘रश्मिरथी’ मेरा प्रिय काव्य ग्रंथ है, किंतु इस विधा में मैंने श्रीकृष्ण सरल जी प्रणीत क्रांतिकारियों पर केंद्रित लगभग पूरा साहित्य पढ़ा है। वह मेरे आदर्श भी हैं। इसी तरह आपके शोध विषय लघु कथा को इस विधा के स्थापना संघर्ष के काल से ही लगातार पढ़ रहा हूँ, किंतु मुझे सर्वाधिक जिस रचना ने प्रभावित किया है वह संभवतः बहुत ही छोटी लघु कथा मानी जाती है। मैं यहाँ उसे उद्धृत भी कर सकता हूँ। उस कथा का भाव कुछ इस प्रकार था- “एक माँ के २ बेटे थे। घर का विभाजन हुआ और तय हुआ माँ को आधे-आधे दिन दोनों बेटे भोजन करवाएंगे। अब १ से १५ तारीख तक माँ छोटे बेटे के घर भोजन करती है और १६ से ३० तारीख तक माँ बड़े बेटे के घर भोजन करती है। ३१ तारीख को माँ का उपवास रहता है।”
इस छोटी सी कथा ने मुझे लघुकथा विधा की ओर अत्यधिक आकर्षित किया और तब से मैं आपकी ही तरह साहित्य विद्यार्थी बनकर लघुकथा पर पर्याप्त पढ़ता रहता हूँ। इसकी समालोचनाओं पर भी मेरी दृष्टि सदैव बनी रहती है।
◾सोनम- क्या कोई ऐसा कार्य है, जो आपके दिल के करीब है ?
🔹डॉ. दवे- बाल साहित्य मेरे हृदय के सबसे करीब रहने वाला विषय है। यदि मैं यह हूँ कि बाल साहित्य के विषय को मैं डियो और इत्र की तरह छिड़कता नहीं, बल्कि यह विषय मेरी धमनियों में रक्त की तरह बहता है तो अतिशयोक्ति बिल्कुल नहीं होगी। मेरे जीवन के साढ़े ३ दशक बाल साहित्य, बाल पत्रकारिता, बाल मनोविज्ञान और बाल साहित्य के शोध में ही व्यतीत हुए हैं। आप जैसे नई पीढ़ी के शोधार्थियों को सहयोग करना यह मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता होती है।
◾सोनम- साहित्यिक जगत में आपको सबसे अधिक प्रभावित किसने किया है ?
🔹डॉ दवे- यूँ तो इस श्रेणी में मेरे प्रेरक तत्व के रूप में अनेक नाम बता सकता हूँ, किंतु मुझे सर्वाधिक श्रीकृष्ण सरल, नरेंद्र कोहली, रामकुमार भ्रमर जैसे रचनाकारों नप्रभावित किया है। बाल साहित्य के क्षेत्र में इस तरह के नाम की गणना करने लगा तो शायद उत्तर बहुत लम्बा हो जाएगा इसलिए अभी उस विषय पर बात नहीं कर रहा, किंतु आपके मूल केंद्रीय विषय के कारण लघु कथा के क्षेत्र में मुझे सर्वाधिक प्रभावित करती हैं कांता राय जी, जो अपने जीवन को इस विधा को कृष्ण बनाकर मीरा की तरह समर्पित कर रही हैं। उन्होंने रचना कर्म से लेकर शोध तक बहुत प्रयास किए हैं। इसी तरह सूर्यकात नागर, सतीश दुबे, सतीश राठी, अशोक भाटी, अंतरा करवड़े, वसुधा गाडगिल, ज्योति जैन जी सहितअनेक लघु कथाकारों ने मुझे प्रभावित किया, किंतु मुझे यह कहने में बिल्कुल संकोच नहीं कि पुरातन और अधुनातन लघु कथाकारों के मध्य मुझे मीरा जैन दीदी से बढ़कर कोई सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न लघु कथाकार आज तक दिखाई नहीं दिया।
◾सोनम- आपकी पसंदीदा पुस्तकें जिसे आप बार-बार पढ़ना चाहेंगे ?
🔹डॉ. दवे- हालांकि, मैंने पूर्व के प्रश्न में अपनी अभिरुचि जागृत होने के संदर्भ में बात करते हुए कुछ पुस्तकों का वर्णन दे दिया किंतु नरेंद्र कोहली जी की ‘तोड़ो कारा तोड़ो’ जो ६ खंडों में स्वामी विवेकानंद जी के जीवन पर केंद्रित उपन्यास है,अत्यधिक प्रिय है। अशोक जामनानी जी के ‘कोsहम’ और ‘खम्मा घणी’ उपन्यास भी मुझे बहुत पसंद है, साथ ही ‘रश्मिरथी’ काव्य को मंत्र की तरह पढ़ता रहता हूँ। उसको पढ़ते हुए कभी मन ही नहीं भरता।
◾सोनम- साहित्य अनेक विधाओं से ओत-प्रोत है, फिर आपने अपने लेखन में बाल साहित्य का चयन ही क्यों किया ?
🔹डॉ. दवे- जैसा मैंने पूर्व प्रश्न के उत्तर में बताया था बाल्य काल से ही एक बड़े ग्रंथालय का हिस्सा बन गया। मेरे जीवन में स्वाध्याय का प्रारम्भ वैश्विक बाल साहित्य को पढ़ने से हुआ। बाद में धीरे-धीरे भारतीय बाल साहित्य भी पढ़ता चला गया और यह अभिरुचि कब भारतीय ज्ञान परंपरा और दर्शन से ओत-प्रोत हो गई, मुझे पता नहीं लगा। आप जैसे शोधार्थियों को कई बार कहता हूँ कि मुझे खुद आश्चर्य होता है कि मैंने छठी से ११वीं कक्षा तक की पढ़ाई के मध्य ही गांधी समग्र, विनोबा समग्र, निराला सामग्र से लेकर ओशो के समस्त दार्शनिक ग्रंथ भी पढ़ लिए थे। ओशो का गीता दर्शन जो उस युग में १८ खंडों में प्रकाशित होता था, उसे भी बहुत अल्पायु में पढ़कर समझने का प्रयास किया। आपसे भी यही आग्रह करूंगा कि दर्शन ग्रंथों को अवश्य पढ़िए, ताकि अपने पुरखों द्वारा छोड़ी हुई भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी आत्मसात भी कर सके और आने वाली पीढ़ीयों को सौंप भी सके।
◾सोनम- आज के समय में आपके क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?
🔹डॉ. दवे- क्योंकि इस समय मध्य प्रदेश शासन की साहित्य अकादमी के प्रमुख के नाते दायित्व का निर्वहन कर रहा हूँ, इसलिए स्वाभाविक रूप से मैंने जिन चुनौतियों को अपने समकक्ष पाया है उनमें सम्मान पुरस्कारों में वर्षों से बने हुए कॉकस को तोड़ना और इन सम्मान पुरस्कारों को ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए हुए जमीन से जुड़े हुए उन रचनाकारों तक पहुंचाने का काम कर रहा हूँ, जो किसी जमाने में साहित्य अकादमी की सीढ़ियाँ चढ़ने में भी डरा करते थे। इतना ही नहीं, व्याख्यान हो या कवि सम्मेलन सब दूर युवा रचनाकारों को प्रोत्साहन देना, उन्हें मंच देना और उनका मार्ग प्रशस्त करना यह मेरी अभिरुचि का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मैं इसमें सफल भी रहा हूँ।
◾सोनम- आप अपने काम में किन विषयों पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं ? क्या कोई विशेष मुद्दा है, जो आपको आकर्षित करता है ?
🔹डॉ. दवे- साहित्य में वामपंथियों द्वारा गढ़े गए थोथे भ्रम (नैरेटिव) को ध्वस्त करने में लगा हूँ। दरअसल, हमारे पुरखों की सनातन परंपराओं का मजाक बनाने का एक कुचक्र संपूर्ण साहित्य जगत में रचा गया। स्वतंत्रता के ७५ वर्ष बाद हम यह प्रयास कर रहे हैं कि अपनी श्रेष्ठ परंपराओं को नई पीढ़ी के समक्ष गौरव के साथ रख सकें, साथ ही भारत के पास ऐसा बहुत कुछ है जो सम्पूर्ण विश्व को दिशा देने में समर्थ है, ऐसे समस्त विषयों पर नई पीढ़ी के बच्चों को न केवल स्वाध्याय के लिए प्रेरित करता हूँ, बल्कि उन्हें अपनी-अपनी पसंद की विधाओं में लेखन के लिए भी आग्रह करता हूँ। इन दिनों मैं आग्रहपूर्वक युवा रचनाकारों से यह कहता हूँ कि वह भारतीय परिवार परंपरा, स्व का बोध, पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य और सामाजिक समरसता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर लेखन करें। मुझे प्रसन्नता है कि इन विषयों पर लिखने वाले युवाओं की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है।
◾सोनम- जीवन में अनेकानेक जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के साथ आप सभी स्थानों पर अपना शत-प्रतिशत देते आए हैं। यह कैसे संभव हो पाता है ? कृपया इस संदर्भ पर प्रकाश डालिए। क्या कोई खास कार्यशैली है ?
🔹डॉ. दवे- मैंने सामाजिक संपर्क के आधुनिक माध्यमों अर्थात सोशल मीडिया पर अपने अकाउंट पर एक वाक्य लिखा हुआ है-“मैं बच्चों के बीच रहता हूँ इसलिए बचपना बाकी है”। सच पूछिए तो मेरी कार्यशैली का मूल यही है। मैं न केवल बच्चों के साथ, बल्कि आप जैसे युवा मित्रों के साथ भी अत्यंत मित्रवत व्यवहार करता हूँ। यह स्नेह ही मुझे शक्ति प्रदान करता है। उसके बाद कार्य क्षेत्र में आई हुई चुनौतियाँ हो या तनाव, कोई भी बात मुझे प्रभावित नहीं कर पाती। यही कारण है कि हँसते-खेलते बड़े से बड़े कार्य सम्पन्न हो जाते हैं। निश्चित तौर पर इन कार्यों को करने के लिए टोली की आवश्यकता होती है। कई बार यह टोली कार्यालयीन रूप से पर्याप्त नहीं होती, तब साहित्य जगत के सारे ईष्टमित्र मेरी टोली का हिस्सा हो जाते हैं। मुझे यह कहते हुए गर्व है कि मध्य प्रदेश का प्रत्येक रचनाकार मेरे प्रति अगाध स्नेह रखता है। मुझमें उन्हें कभी मित्र,बेटा, छोटा भाई, बड़ा भाई तो कभी पिता की छवि दिखाई देती है। इन सामाजिक संबंधों को ही मजबूत बनाते हुए हमने सम्पूर्ण मध्य प्रदेश में साहित्य की एक लहर खड़ी करने का प्रयास किया और हम उसमें सफल भी रहे। किसी को मुझसे कुछ सीखने को मिलेगा, यह तो नहीं मानता पर मेरा जीवन खुली पुस्तक की तरह है,, जो चाहे पढ़े।
◾सोनम- आपके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा क्या है ? क्या कोई खास व्यक्ति, घटना या विचार है जो आपको प्रेरित करता है ?
🔹डॉ. दवे- मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा तो अब इस जगत में नहीं हैं। मेरे पिताजी ने मुझे साहित्य और स्वाध्याय से जोड़ा, वहीं जीवन मूल्यों की शिक्षा मेरी माँ ने मुझे दी है। मेरी माताजी ने मुझे गढ़ने का काम किया है। मेरे एक-एक कोने को घिसकर तराशते हुए उन्होंने पर्याप्त से अधिक ऊर्जा व्यय की, तब जाकर मैं आज जैसा हूँ, वैसा बन पाया। मैं यह नहीं कहता कि मेरे रूप में कोई श्रेष्ठ कृति है, किंतु इस बात के लिए मैं ईश्वर को बहुत धन्यवाद देता हूँ कि मुझे ऐसे माता-पिता मिले जिन्होंने मुझे जीवन की यात्रा में शुचिता और मर्यादा के साथ रहने योग्य बनाया।पत्नी, बेटा और बेटी भी मेरे प्रेरणा के तत्व हैं।
◾सोनम- आप भविष्य में क्या करना चाहते हैं ? आपके आगामी लक्ष्य क्या हैं ?
🔹डॉ. दवे- ईश्वर हमें लक्ष्य की ओर ले जाता है, तो फिर हमें लक्ष्य की अधिक चिंता नहीं करना होती। बाल साहित्य के क्षेत्र में ३२ वर्ष काम करने के बाद मैंने कभी सोचा नहीं था कि बड़ों के साहित्य में न केवल कार्य करने का अवसर मिलेगा, बल्कि संपूर्ण मध्य प्रदेश को नेतृत्व देने का काम भी मेरे हिस्से आएगा, किंतु ईश्वर ने यह सब मुझे सौंपा। मैं आगे की चिंता नहीं करता, किंतु मन केवल इतना है कि जीवनभर बाल साहित्य की सेवा करता रहूँ, क्योंकि वह विषय मेरे हृदय के सर्वाधिक निकट है इसलिए मेरा मन भी उसी में रमता है।
◾सोनम- यदि भारतीय शिक्षा प्रणाली और शोध क्षेत्र में कोई परिवर्तन का अवसर मिले तो आप किस तरह का बदलाव करना चाहेंगे ?
🔹डॉ. दवे- शोध को लेकर हमारे देश में पर्याप्त कार्य करने की आवश्यकता है। हम कई बार पश्चिम जगत का परंपरागत जीवन मूल्यों के आधार पर विरोध तो करते नजर आते हैं, किंतु मुझे लगता है कि शोध के क्षेत्र में हम लोगों को पश्चिमी जगत से प्रेरणा लेनी चाहिए। इन दिनों संपूर्ण शोध वृत्ति एक ‘टाइप्ड मेकैनिज्म’ में बदलकर रह गई है। समय-समय पर नकल पट्टी रोकने के लिए कुछ एप और कुछ सॉफ्टवेयर तैयार कर लिए जाते हैं, किंतु उनका भी तोड़ शोधार्थी निकाल लेते हैं। मुझे लगता है मौलिक शोध कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए अब शोध कार्य को भिन्न-भिन्न खाँचों से मुक्त कर देना चाहिए। आखिरकार हम क्यों विज्ञान, मानविकी, वाणिज्य, प्रबंधन, चिकित्सा और अभियांत्रिकी जैसी दीवारों में शोध कार्य को बांधकर रखते हैं। अंतर अनुशासन में शोध की अब पर्याप्त संभावनाएं राष्ट्रीय शिक्षा नीति-२०२० में मुझे दिखाई दे रही है। इसलिए यदि ठीक ढंग से शिक्षा नीति को जमीन पर उतारने का काम इस देश के शिक्षाविद कर लेंगे तो निश्चय ही उच्च शिक्षा और शोध क्षेत्र का कायापलट हो जाएगा।
◾सोनम- आप बाल साहित्यकार हैं, तो क्या आपने अपने पाठक वर्ग से उनकी प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया है ? यदि हाँ तो कैसे ?
🔹डॉ. दवे- मैं जिस पत्रिका का लंबे समय तक संपादक रहा, उसके बाल पाठकों को पत्रिका में ही प्रश्नोत्तरी के रूप में कुछ प्रश्न देता रहता था। उनके उत्तरों से जो निष्कर्ष मुझे प्राप्त होते थे उसके आधार पर पत्रिका के कलेवर में तुरंत परिवर्तन भी कर लेता था। यही कारण रहा कि हमारी पत्रिका विश्व की सर्वाधिक प्रसार संख्या वाली पत्रिका बनी। जिस समय भारत की बड़े-बड़े घरानों की बाल पत्रिकाएं बंद हो रही थी, उस समय हमने ३.७१ लाख पत्रिकाएं प्रति माह पाठकों तक पहुंचाने का काम किया। मुझे लगता है यह सब हमारी शोध वृत्ति के कारण हो पाया, क्योंकि शोध प्रविधियों में साक्षात्कार और विश्लेषण के अतिरिक्त प्रश्नोत्तरी भी एक महत्वपूर्ण साधन होता है, जिसका उपयोग इस समय आप भी कर रही हैं। बस इसी अस्त्र को मैंने अपने बाल पाठकों के हृदय के भाव जानने के लिए अपनाया और इस कार्य में हमारी टोली को सफलता भी लगातार मिली।
यह बात तो बाल पत्रकारिता की हुई,, किंतु बाल साहित्य का सबसे सटीक मानक होता है पुस्तक की बिक्री। हालांकि, यह थोड़ा कठोर भाव है किंतु यह तय है कि यदि आपकी पुस्तक विक्रय नहीं हो रही तो यह मानकर चलना चाहिए कि वह पुस्तक और उनकी सामग्री बाल हृदय को प्रभावित नहीं कर रही है। यदि इसे आप मेरी आत्म प्रशंसा ना मानें तो एक उदाहरण देता हूँ। नेशनल बुक ट्रस्ट से मेरा एक बाल कहानी का संग्रह प्रथम बार वर्ष २०२३ में आया। उसके पश्चात उसका दूसरा संस्करण २०२४ में और तृतीय संस्करण २०२५ में प्रकाशित हुआ। यह तीनों संस्करण निश्चित तौर पर ५० हजार संख्या से कम के नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि एक ही पुस्तक लगभग डेढ़ लाख बिक चुकी है। अभी पिछले सप्ताह उसका असमिया में अनुवाद होकर प्राप्त हो गया है। सवाभाविक है वह भी लगभग ५० हजार छपी होगी। यदि ४-५ कहानियों का एक संग्रह ही २ लाख बिक जाता है और १ लाख के करीब रॉयल्टी मुझ जैसे सामान्य रचनाकार को प्राप्त हो जाती है तो मुझे लगता है कि यही हमारे बाल साहित्य का बच्चों के हृदय को छूने का मानक होना चाहिए। कई बार अच्छे प्रकाशकों का अभाव बहुत श्रेष्ठ बाल साहित्यकारों की रचनाओं को भी पाठकों तक नहीं पहुंचा पाता, लेकिन यह एक भिन्न विषय है।
◾सोनम- क्या कोई ऐसा पल है जो आपको हमेशा याद रहेगा ?
🔹डॉ. दवे- मैं व्यक्तिगत जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य क्षेत्र से जुड़ा हूँ। वह एक प्रकार से तपस्या का क्षेत्र है। वहाँ पर आर्थिक प्राप्तियाँ नहीं के बराबर है और श्रेय तो प्राप्त करने का सोचा भी नहीं जाता, किंतु समाज जीवन के इस क्षेत्र ने मुझे जो दिया है वह मेरी अपेक्षाओं से बहुत ज्यादा है। साहित्य अकादमी के निदेशक का पद प्राप्त हो जाना या विश्वविद्यालयों के कुलगुरु के रूप में मेरा नाम प्रस्तावित होना, समय-समय पर केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक अनेक बड़ी समितियों में मुझे नामित किया जाना, इन सबकी मैंने कभी कल्पना नहीं की थी। इसलिए स्वाभाविक रूप से इस तरह की प्राप्तियाँ मन को प्रसन्नता भी देती है और अपने मूल वैचारिक अधिष्ठान के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ा देती है। देश के राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान में जब प्रधानमंत्री जी ने मुझे ब्रांड एंबेसेडर मनोनीत किया था और गोवा के राजभवन से राज्यपाल मृदुला सिन्हा जी का इस संदर्भ में मुझे जब पत्र मिला था, वह क्षण मेरे लिए बहुत प्रसन्नता का था। उसके बाद अकादमी के निदेशक का दायित्व मिलना भी मेरे लिए एक बहुत बड़ा आश्चर्य का विषय रहा। यूँ तो जीवन में ऐसे अवसर बहुत आए हैं, सब प्रभु की कृपा है और संगठन देवता का आशीर्वाद भी।
◾सोनम- आपके जीवन का ऐसा प्रसंग जो आप वर्तमान पीढ़ी से साझा करना चाहते हों।
🔹डॉ. दवे- बात लगभग डेढ़ दशक पूर्व की है। ‘देवपुत्र’ का संपादक होने के नाते में एक अच्छी पहचान के साथ इंदौर महानगर में निवास कर रहा था। इतने लंबे समय में स्वाभाविक रूप से सभी प्रशासनिक अधिकारी व्यक्तिगत स्तर पर जानते भी रहे, क्योंकि पत्रिका के कार्यालय में सामाजिक, प्रशासनिक, राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से बड़े पदों पर बैठे हुए लोग जिन्हें नई पीढ़ी वीआईपी मानती है, आते रहे। एक बार हम लोग अपनी पत्रिका के बंडलों को हमारी लोडिंग रिक्शा में भरकर पोस्ट ऑफिस तक छोड़ने के लिए जा रहे थे। यह हम लोगों का नियमित क्रम होता था और हमारी टोली के कार्यकर्ताओं के साथ मैं भी सामान्य ढंग से उन बंडलों को ढोने का काम किया करता था। एक बार यातायात विभाग के जिले के एस.पी. जो एक बहन थी, उन्होंने हमारी गाड़ी को एक चौराहे पर रोक लिया। वाहन चालक ने कहा कि पीछे बंडलों के साथ हमारे साहब भी बैठे हैं, एक बार उनसे आप बात कर लीजिए। एस.पी. महोदया ने जब रिक्शा का पीछे का दरवाजा खुलवाया तो उसमें सिकुड़ कर छोटी-सी जगह में मैं बैठा हुआ था। मुझे देखकर वह भौंचक रह गई क्योंकि एक-दो दिन पहले ही राज्यपाल भाई महावीर के प्रवास के कारण से वह सुरक्षा जांच के लिए हमारे कार्यालय में आई थीं और मुझसे उनकी एक लम्बी और बहुत स्वस्थ वार्ता हुई थी। उनके लिए यह आश्चर्य का विषय था कि किसी पत्रिका का संपादक इस तरह स्वयं लोडिंग रिक्शा में पीछे बैठकर बंडलों को पोस्ट ऑफिस छोड़ने जा रहा है। उन्होंने बहुत सम्मान के साथ मुझे नीचे उतारा और अपनी लाल बत्ती की गाड़ी में मुझे पोस्ट ऑफिस तक छुड़वाया। मैंने बहुत आग्रह भी किया कि बहन जी मैं इस तरह के कार्यों का अभ्यस्त हूँ। आज आपकी गाड़ी से मैं चला भी जाऊंगा किंतु यह हम लोगों का रोज का काम है इसलिए इतनी कृपा मत करिए, किंतु वे मानी नहीं। उस प्रसंग को मैंने अनेक अवसरों पर नई पीढ़ी के बच्चों को सुनाते हुए कहा भी है कि बड़ी कुर्सियों पर बैठ जाना पर्याप्त नहीं होता, अपने भीतर के मनुष्य को जागृत रखिए और परिश्रम करते समय किसी भी कार्य को छोटा या बड़ा नहीं समझें। प्रबंधन का भी सूत्र है कि आप जिस टोली के साथ काम करते हैं, उस टोली का सदस्य बनकर ही काम करना चाहिए। उसका नेता बनने की कोशिश की तो आप अपने कार्य क्षेत्र में असफल हो जाएंगे।
◾सोनम- आपके लिए सबसे कठिन निर्णय क्या था ? क्या कोई ऐसा समय था जब आपको मुश्किल चुनाव करना पड़ा ?
🔹डॉ. दवे- इन दिनों तो शासकीय क्षेत्र में मेरा पाला वरिष्ठतम प्रशासनिक अधिकारियों से भी पड़ता है और राजनेताओं से भी। मेरे लिए सबसे कठिन समय होता है जब कुछ लोग मुझे वह कार्य करने के लिए दबाव बनाते हैं, जिनको करने की मेरे जीवन मूल्य अनुमति नहीं देते। यही कारण है कि ऐसे अवसरों पर मैं पूरी दृढ़ता और सम्मान को सुरक्षित रखते हुए उस कार्य के लिए स्पष्ट मना कर देता हूँ। मुझे लगता है कि ऐसी चुनौतियाँ मेरे लिए बहुत कठिन होती हैं किंतु ईश्वर की कृपा है कि आज तक एक बार भी मुझे अपने नैतिक और जीवन मूल्यों से कभी समझौता नहीं करना पड़ा। निर्णय करते समय इस तरह के कठिन निर्णय मुझे कभी विचलित नहीं कर पाए। यही कारण है कि २ कार्यकाल में मेरी ईमानदारी पर आज तक कोई संशय खड़ा नहीं हुआ।
◾सोनम- आप अपने काम में किन तकनीकों का उपयोग करते हैं ? क्या कोई खास विधि है जो आपके लिए महत्वपूर्ण है ?
🔹डॉ. दवे- मुझे समाज जीवन में काम करने के लिए अपने मूल संगठन से केवल एक सूत्र वाक्य प्राप्त हुआ है और वह है- “शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है।” मेरा काम करने का वही मूल मंत्र है और मुझे लगता है कि प्रबंधन के सारे सूत्र इस एक सूत्र के सामने पानी भरते हैं। निश्चित ही जीवन में प्रत्येक मनुष्य को इस एक सूत्र का वरण कर लेना चाहिए। शेष सारे काम स्वतः सम्पन्न होते चले जाते हैं। मेरे लिए यही एकमात्र विधि और तकनीक सबसे महत्वपूर्ण है।
◾सोनम- आपके क्षेत्र में नवाचार की क्या संभावनाएं हैं ? आप कैसे नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं ?
🔹डॉ. दवे- नवाचार की संभावनाएं तो प्रत्येक क्षेत्र में बनी ही रहती है। मेरे कार्य के क्षेत्र बहुआयामी होने के कारण से समानांतर रूप से अनेक क्षेत्रों में सक्रिय रहता हूँ, किंतु प्रत्येक क्षेत्र में काम करते हुए मैंने अनुभव किया कि नवाचार की आवश्यकता तो हर जगह होती ही है। नए ढंग से सोचना, नए ढंग से काम करना यह मेरी मूल वृत्ति रही है। यही कारण है कि चाहे में बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में रहा हूँ या इन दिनों बड़ों के साहित्यिक क्षेत्र में काम कर रहा हूँ, इन दोनों जगह पर मैंने खुलकर अपने विचारों को झरने की तरह बहने दिया। देखते ही देखते मध्यप्रदेश का संपूर्ण साहित्यिक परिदृश्य इस समय बदल चुका है। मैं कभी भी ऐसा नहीं सोचता कि यह सब किसी विकास दवे के कारण हुआ है, बल्कि यह एक सामूहिक काम था और उस टोली का मैं एक छोटा-सा हिस्सा बनकर काम कर रहा था। निश्चय ही ईश्वर ने तय किया था कि इस समय इस क्षेत्र में यह सभी परिवर्तन होना है इसलिए प्रभु ने मुझे साहित्य अकादमी तक भेजा।
◾सोनम- आपके लिए सबसे बड़ा जोखिम क्या है ? क्या कोई ऐसा क्षेत्र है, जहाँ आप जोखिम उठाने से नहीं डरते ?
🔹डॉ. दवे- इसे आप मेरी आत्म प्रशंसा मत मानिए, किंतु ईश्वर साक्षी है कि मैं कभी भी किसी भी क्षेत्र में जाने से डरता नहीं और न मैं इन चुनौतियों का सामना करने से भयभीत होता हूँ। मुझे नियति जहां-जहां भेजेगी मैं अपना उदात्त (एक्सट्रीम) देने का प्रयास करूंगा। बस इस भाव के कारण अब तक तो मुझे कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ा। आगे भी मेरा यही सिद्धांत काम करता रहेगा। जिस क्षेत्र में कार्य करने का अवसर मिलेगा, मैं वहाँ रहकर उसे श्रेष्ठतम ढंग से सम्पन्न करने का प्रयास करूंगा। पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरे गुरु रहे श्रद्धेय कृष्ण कुमार जी अष्ठाना कहा करते थे कि “कोई भी मनुष्य जब अपने जीवन में ‘चलेगा’ शब्द को स्वीकार लेता है, तो फिर वह फिसलने लगता है। समझौते करने लगता है। न्यूनताओं की ओर बढ़ने लगता है।” इसलिए उन्होंने एक मूल मंत्र दिया- ‘चलेगा’- नहीं चलेगा। बस इस मंत्र को अंगीकार करिए। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में आदर्श कार्य करने के पथ से स्खलित नहीं होगा।
◾सोनम- आप अपने काम में किन मूल्यों को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं ? क्या कोई खास सिद्धांत हैं जो आपके काम को निर्देशित करते हैं ?
🔹डॉ. दवे- सभी के प्रति सद्भाव रखना, द्वेष रहित जीवन जीना, स्नेह पूर्ण व्यवहार करना, अहंकार से सदैव स्वयं को मुक्त रखना, अपने साथ की टोली के प्रत्येक सदस्य की चिंता करते हुए उसकी प्रगति को सुनिश्चित करना, ईमानदार बने रहना अर्थात आर्थिक शुचिता और मर्यादा का अत्यधिक कठोरता से पालन करना, अपनी वैचारिक दृढ़ता को कभी विचलित न होने देना, चरित्र को लेकर सदैव दृढ़ता बनाए रखना, छोटे से लेकर बड़े तक किसी आकर्षण के व्यामोह में नहीं फंसना इतनी बातों के परिपालन को सुनिश्चित कर लें। बस इन पर दृढ़ता बनी रहे तो सफलता चरण चूमती है।
◾सोनम- आपको क्या लगता है, आपके काम में सबसे बड़ी कमी क्या है ? क्या कोई ऐसी चीज है जिसे आप सुधारना चाहते हैं ?
🔹डॉ. दवे- अपने कार्य को लेकर तो मैं सदैव संतोषी आत्मा रहा हूँ। प्रत्येक क्षेत्र में कितना भी कार्य कर लूं, कितनी भी सफलता मिल जाए मेरा मन नहीं भरता। सदैव मुझे लगता रहता है कि आज जो कुछ किया है उससे कुछ और आगे, कुछ और अच्छा कैसे किया जा सकता है ? यह चिंतन मेरे मानस पर २४ घंटे चलता रहता है किंतु मेरे व्यक्तित्व की कमियों को सुधारने के प्रयास मैं लगातार करता रहता हूँ। उदाहरण के लिए मैं जब किसी से बातचीत करता हूँ तो यह प्रयास रहता है कि सामने वाले को अधिकतम सुनूं। मैं उस पर प्रतिक्रिया कम दूं अथवा स्वयं कम बोलूं, किंतु इस कार्य में असफल हो जाता हूँ। अक्सर अपनी समझ देने का मोह छोड़ नहीं पाता। इस दुर्गुण से थोड़ा मुक्त होने का प्रयास कर रहा हूँ। साथ ही अत्यधिक भावुक व्यक्ति हूँ। कोई भी व्यक्ति मुझे यदि स्नेहपूर्ण व्यवहार से कोई कार्य बताता है तो तुरंत उस काम को सम्पन्न करने में लग जाता हूँ या सहयोग के रास्ते खोजने लगता हूँ, भले ही वह मेरी सीमाओं से परे हो। आधुनिक युग की चतुराई पूर्ण व्यवहार क्षमताओं से वंचित हूँ। मुझे नहीं लगता कि अपने व्यवहार में मैं इन कमियों को कभी सुधार पाऊंगा, लेकिन प्रयास तो करना ही है।
◾सोनम-आप अपने काम के अलावा किन चीजों में रुचि रखते हैं ?आपके शौक या पसंदीदा गतिविधियाँ क्या हैं ?
🔹डॉ. दवे- मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बाल्यकाल से ही कार्यकर्ता रहा हूँ। मेरी साहित्य के अतिरिक्त एकमात्र अभिरुचि मेरा वह मूल कार्य ही है और मुझे लगता है कि वह एक कार्य अंगीकार कर लेने के बाद अब किसी और कार्य के प्रति मेरा आकर्षण होना मृत्यु पर्यंत संभव नहीं होगा। मैं अपने इस एक मार्ग पर जीवन पर्यंत चलते रहना चाहता हूँ। यही मेरा अभीष्ट भी है।
◾सोनम- विकास जी! आपकी अत्यंत व्यस्त दिनचर्या में जब कभी आपको खाली समय मिलता है तो आप उस खाली समय का सदुपयोग किस तरह करते हैं ?
🔹डॉ. दवे- सोनम! सबसे पहली बात तो यह कि अब मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे खाली समय प्राप्त ही नहीं होता। मुझे इन दिनों २४ घंटे कम लगते हैं। कई बार लगता है काश! ईश्वर एक दिन को ४८ घंटे का बना दे। कार्य की अधिकता भी है और उसे समय से पूर्ण करने की सिद्धता भी, इसलिए खाली समय जैसा शब्द युग्म अब जीवन में बचा ही नहीं। हाँ! यह अवश्य है कि इतनी व्यवस्थाओं के बीच भी मुझे इन दिनों अनेक पुस्तकों की भूमिका लिखना, शुभकामना संदेश देना और प्रतिदिन होने वाले ३ से ४ कार्यक्रमों में वक्तव्य देने की दृष्टि से स्वाध्याय करना पड़ता है, इसलिए पढ़ना- लिखना यह होता रहता है। यूँ तो खाली समय मिलता ही नहीं, किंतु जिसे हम खाली समय की परिभाषा में आकलित करते हैं उस समय का उपयोग मैं सदैव स्वाध्याय के लिए करता हूं। यह पढ़ना-लिखना मेरा कभी भी बंद नहीं होता। हाँ, यह अवश्य हो जाता है कि इन दिनों भोजन और निद्रा जैसे महत्वपूर्ण काम भी अब कम होने लगे हैं। उनका स्थान भी धीरे-धीरे इसी स्वाध्याय ने ले लिया है।
◾सोनम- संगीत का आपके जीवन में क्या महत्व है ?
🔹डॉ. दवे- मध्यप्रदेश की राजधानी में विगत ५ वर्षों से दायित्व के कारण परिवार से दूर अकेला रह रहा हूँ। भोजन बाहर ही होता है इसलिए स्वाभाविक रूप से गृहस्थी के नाम पर मेरे पास एक पढ़ने लिखने की टेबल, रात्रि विश्राम के लिए पलंग और एक छोटा-सा म्यूजिक सिस्टम यही कुल मिलाकर मेरी गृहस्थी है। इस छोटे से सेट-अप में जो सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, वह संगीत ही है। मेरे पिताजी शास्त्रीय संगीत के बहुत अच्छे ज्ञाता थे। स्वयं रचनाओं को शास्त्रीय रागों पर संगीतबद्ध करना यह उनकी रुचि का विषय हुआ करता था। यही कारण है कि मैं भी संगीत से हृदय से जुड़ा हुआ हूँ, किंतु मेरा केवल सुनना भर हो पता है। यह मुझे बाहरी जीवन के तनाव और अवसादों से बचाए रखता है।
◾सोनम- आप अपने युवा साथियों को क्या संदेश देना चाहेंगे ? जो लोग आपके क्षेत्र में कदम रखना चाहते हैं, उन्हें आप क्या सलाह देंगे ?
🔹डॉ. दवे- साहित्य क्षेत्र में पदार्पण करने वाले मेरे युवा मित्रों से मैं ३-४ आग्रह अवश्य करना चाहूंगा। पहली बात लेखन के क्षेत्र में जब भी काम करें तो ऐसा कोई लेखन किसी वैचारिक आग्रह के कारण न करें, जो हमारे देश और हमारी संस्कृति को अपमानित करे।
दूसरी सलाह सदैव मौलिक लेखन की दृष्टि से समृद्ध रहें। इधर-उधर से प्लॉट चुराना या भावनात्मक साम्य रखने वाली रचनाएं लिख लेना बहुत अच्छा स्वभाव नहीं है।
तीसरी सलाह यह दूंगा कि छपने के मोह से सदैव मुक्त रहें। जो युवा मित्र मंचीय कविता के क्षेत्र में काम कर रहे, वे मंचों के मोह से मुक्त रहेंगे तो श्रेष्ठतम रचना कर्म दे पाएंगे।
चौथी सलाह अपनी मातृभाषा के प्रति अत्यधिक आग्रही रहिए। अन्य भाषाओं के वे शब्द प्रयोग करिए जिन्हें करना विषय के लिए अत्यधिक अनिवार्य हो, अन्यथा अपनी भाषा ही श्रेष्ठतम माध्यम होगा आपके विचारों को प्रकट करने का। मैं जब मातृभाषा कह रहा हूँ तो इसे केवल हिंदी ना मानें। इस मातृभाषा के अंतर्गत मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, तेलुगू सभी भारतीय भाषाएं आती हैं। जिस भाषा को अपने बाल्यकाल से श्रवण किया है और बोला है, जिस भाषा में आप विचार करते हैं, वही आपकी मातृभाषा है। उसे ही प्राथमिकता दीजिए।
मुझे लगता है इन ४ सलाह पर काम करिए, आगे सफलता स्वतः आप तक चली आएगी।
◾सोनम- आगामी पुस्तक किस विधा पर आधारित है और कब तक पाठकों को प्राप्त होने की संभावना है ?
🔹डॉ. दवे-इन दिनों लेखन कार्य थोड़ा-सा शिथिल हुआ है। लेखन का प्रकार बदला है। पत्र-पत्रिकाओं की अत्यधिक अपेक्षाएं रहती है कि मैं उनके लिए लिखूं, इसलिए व्यक्तिगत मौलिक लेखन लगभग हाशिए पर है। ऐसा नहीं कि पत्र-पत्रिकाओं के लिए जो लेखन होता है, वह मेरा व्यक्तिगत नहीं होता किंतु वह तात्कालिक होता है और प्रदत्त विषय पर लिखना पड़ता है। मैं नहीं चाहता कि इस तरह की सीमाओं में बन्ध कर लेखन करूँ। भविष्य में अनेक योजनाएं हैं, जिन पर काम करना है किंतु केंद्र में तो बाल साहित्य ही है। इन दिनों बड़ों के साहित्य के क्षेत्र में काम करते हुए बाल साहित्य से थोड़ा-सा दूर हुआ हूँ। इस दूरी को पाटना मेरे जीवन का प्रथम लक्ष्य होगा। कह तो नहीं सकता किंतु अगली जो भी पुस्तक आएगी, वह बाल मन को केंद्र में रखकर ही लिखूंगा, यह पक्का है।
◾सोनम- आपका हृदय से धन्यवाद महोदय।
🔹डॉ. दवे- सोनम, आपको भी बहुत सारा धन्यवाद कि आपने इतने अच्छे प्रश्न किए। हालांकि प्रथम दृष्टया मुझे लग रहा था कि आप मुझसे लघु कथाओं पर केंद्रित होकर बातचीत करेंगी, क्योंकि आप इस विषय की शोध अध्येता हैं किंतु इस साक्षात्कार के प्रश्न सर्वव्यापी और सर्वस्पर्शी रहे, इसलिए भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्नों के उत्तर भी भिन्न-भिन्न मानस से मैंने दिए हैं। आपको भी ढेर सारा धन्यवाद। खूब सारा स्नेहाशीष।