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मैं क्यों न ढहूँ..! बताओ

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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मैं क्यों न ढहूँ ? मुझे बताओ, सब कुछ कुरेदा मुझसे तुमने,
अंधा विकास कर चले हो तुम, सुरंग भी छेदा मुझसे तुमने।

मैं रोया या हँसा, तुम्हें क्या ?, तुम्हें तो विकास करवाना था,
मैं कमजोर होऊं, तुम्हें क्या ?, तुम्हें तो मुझे बस कटवाना था।

बड़ी-बड़ी मशीनें, प्रोजेक्ट व सड़कें, काट के मुझे बनवाए हैं,
दोहन करके मेरा ही तुमने, ये ईंट-गैरों के महल बनवाए हैं।

आज में ढहा हूँ, बादल फट बहा हूँ, यह मेरी भी मजबूरी है,
प्रहार बरसात का झेलने खातिर, मुझमें मजबूती जरुरी है।

मुझसे तुमने, बहुत कुछ लुटा, मेरे लिए कुछ किया है क्या ?,
मैंने तुमको सदियों से दिया, मुझे तुमने कुछ दिया है क्या ?

क्यों कोस रहे हैं सरकारों को ? बादल फटने और बाढ़ को ?,
‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’, सुधारो अपने व्यवहार को।

पर्वत है कहता, ‘मैं कुदरत का बेटा’, मेरी किसने मानी है ?
नुकसान पहुंचा कर मुझको पगलों, तुम्हारी ही तो हानि है॥