राधा गोयल
नई दिल्ली
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युद्ध और शांति-जरूरी क्या ?…
अपने हित साधन में कोई
तानाशाह जिद पर अड़ा है,
जगह-जगह पर युद्ध छिड़ा है
यूक्रेन से रूस भिड़ा है,
चार वर्ष से लगातार
यूक्रेन रूस में युद्ध छिड़ा है,
मैं क्यों युद्ध विराम करूँ ?
इस जिद पर हर कोई अड़ा है।
वह युद्ध अभी थमा नहीं कि
नये युद्ध कई शुरु हो गए,
अफगानिस्तान का युद्ध
खत्म हो भी न पाया,
कि इजराइल-हमास में युद्ध छिड़ गया
मिसाइलें इतनी दागी गईं,
कि लाशों का अम्बार लगा है
दफनाने की जगह नहीं।
बदबू के कारण
साँस भी लेना कठिन हुआ है,
चीख पुकार मची है भारी
जीने की हो गई लाचारी,
लाखों काल के गाल समा गए
लाखों हो गए घायल,
माँगों का सिन्दूर मिट गया
चीख रही पाँवों की पायल।
लुटी नारियों की अस्मत
बाजार लगाया जिस्मों का,
ऊँचे दामों पर बेचा
अम्बार लग गया जिस्मों का,
बच्चों का क्रन्दन सुन-सुन कर
दिल मर्माहत हो जाता है,
जाने कब ये युद्ध रुकेगा
सोच-सोच दिल घबराता है।
आज मनुज हो गया दनुज
मानवता भूल गया,
अपनी स्वार्थ पूर्ति हित
जग के हित को भूल गया,
किसी देश की तानाशाही ने
कितना विध्वंस किया,
यह विनाश देखकर
तानाशाह बेहद मन मुदित हुआ।
विश्व की ऐसी दशा देखकर
घायल मन बस यह दोहराए,
हे प्रभु बहुत विध्वंस हो चुका
आगे और न होने पाए,
कोई देश विध्वंस मचाकर
झूम-झूम कर इतराता है,
जिनके अपने मरे युद्ध में
उनका दु:ख न दिख पाता है।
भारी घमासान है जारी,
जीना ही दुश्वार हुआ है,
संवेदना शून्य लोगों के
मन पर तनिक न असर हुआ है,
अन्य देशों के संसाधनों पर
अधिकार जमाना ही आता है,
बेशक लाखों ही मर जाएं,
उसको अपना हित भाता है।
संवेदनाएं मर गई हैं जिनकी
कोई मरे बला से उनकी,
अपनी स्वार्थपूर्ति के कारण
लील लिया कितनों का जीवन,
देख-देख लोगों का क्रन्दन
घायल हुआ कवि का तन मन,
जाने क्यों मनुष्य की
लुप्त हुई संवेदना।
ऐसे दनुज को देखकर
कवि मन में बेहद वेदना,
जहां संवेदनाएं मुस्कुराएं
पीड़ा गीत बन जाए,
कभी बन जाए दुश्मन और
कभी वो मीत बन जाए।
ऐसे लोगों की बातों पर,
भरोसा मत कभी करना॥