पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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युद्ध और शांति-जरूरी क्या ?
वर्तमान समय में पूरा विश्व, युद्ध की विभीषिका के परिणामों से प्रभावित हो रहा है। हमारे देश भारत में भी कोई ‘लॉकडाउन’ की बात कर रहा है तो कोई एलपीजी गैस, तो कोई पेट्रोल, तो कोई डीजल के लिए कतार में लगा हुआ है। सब तरफ अफवाहों का बाजार गर्म है, यह सब तब हो रहा है, जबकि अपने देश में युद्ध नहीं हो रहा है। ईरान और इजराइल के साथ खाड़ी देशों में जहाँ मिसाइल और ड्रोन द्वारा आक्रमण हो रहे हैं, वहाँ के हृदयविदारक दृश्य जनमानस के दिल को दहला देते हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान द्वारा किए गए गतिरोध के कारण अनेक देशों के जरूरी सामानों से लदे जहाज फँसे हुए हैं और जिसकी वजह से व्यापारिक अवरोध उत्पन्न होने के कारण तेल, गैस के अतिरिक्त अन्य दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई है। अनेक उद्योग प्रभावित हो रहे हैं एवं पेट्रोल और गैस की किल्लत से हमारे देश के अतिरिक्त अन्य में भी लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कुछ देशों में पेट्रोल और डीजल के मूल्य आसमान छू रहे हैं। कई देशों में इनकी कमी से अफरा-तफरी के साथ ही सामान्य जनजीवन प्रभावित हो रहा है।
युद्ध का परिणाम केवल तबाही होता है। हमेशा से, चाहे रामायण काल का राम-रावण युद्ध या महाभारत काल का कौरव-पांडव के बीच का युद्ध, अपने पीछे छोड़ जाता है विनाश और तबाही का भयानक मंजर। सदियों में किए गए विकास कार्य युद्ध की विभीषिका में खंडहर बन जाते हैं, जिनको फिर से विकसित करने में अगली सदियाँ लग जाती हैं। जो जनसामान्य लोग इस समय युद्ध की विभीषिका को झेल रहे हैं, जिनके सगे-सम्बंधी युद्ध की भेंट चढ़ गए, दुधमुँहे बच्चे अनाथ हो गए, वे तो आजीवन इस युद्ध की आग में झुलसते रहेंगे और इस दर्द को कभी भूल नहीं पाएंगे।
युद्ध मानवता और प्रकृति दोनों के लिए विनाशकारी अभिशाप है। पुरातन काल से हम सभी ने देखा है कि युद्ध सत्ता-लिप्सा, स्वयं के प्रभुत्व, व्यापार, वैमनस्य, आधिपत्य की इच्छा से लड़ा जाता है, परंतु परिणाम जीतने और हारने वाले दोनों पक्षों को भुगतना पड़ता है। परिणाम मुख्य रूप से जनता भुगतती है, क्योंकि लड़ाई केवल सीमा पर नहीं लड़ी जाती, वरन् अनेक मोर्चों पर जनता उससे प्रभावित होती है। जैसे अभी हम सभी गैस को लेकर चिंतित और प्रभावित दिखाई पड़ रहे हैं। कुछ समय में आयात और निर्यात किए जाने वाले सभी सामानों पर इसका असर दिखाई पड़ेगा तथा इस वजह से जनजीवन की सामान्य ज़िंदगी में कठिनाइयाँ आने लगेंगी।
युद्ध केवल लोगों को नहीं मारता और घरों को ही नहीं नष्ट करता; वह उन सारी प्रणालियों को भी नुकसान पहुँचाता है जो जीवन को संभव और सुलभ बनाती हैं, जिनमें जल नेटवर्क, सीवेज संयंत्र, कृषि भूमि, बंदरगाह, ईंधन डिपो और गैस, तेल कुएँ तथा बिजली का बुनियादी ढाँचा शामिल है। लड़ाई समाप्त होने के बाद भी लम्बे समय तक प्रदूषित हवा, दूषित मिट्टी और असुरक्षित जल मौजूद रहता है, जिसके प्रभाव से वहाँ के लोगों को आजीवन संघर्ष करते रहना पड़ता है।
युद्ध के कारण लाखों परिवार बेघर हो जाते हैं, बच्चे और महिलाएँ अनाथ हो जाते हैं। जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है। देश की आर्थिक व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित होती है। युद्ध के समय हथियारों और सैन्य सामग्री पर अत्यधिक खर्च होता है, जिसके कारण शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास कार्यों की उपेक्षा होती है।
युद्ध केवल विनाश करता है, उसकी वजह से लोगों की मौत होती है, भुखमरी होती है, साथ ही अनेक परिवारों के उनके सगे-सम्बंधी हमेशा के लिए बिछड़ जाते हैं। उनके घर उजड़ जाते हैं। यह वर्षों से संजोई हुई प्राचीन धरोहरों को नष्ट कर देता है और आर्थिक प्रगति को रोककर देश को वर्षों पीछे ढकेल देता है।
युद्ध का प्रभाव केवल मानवीय क्षति तक ही सीमित नहीं रहता, वरन् सामाजिक क्षेत्रों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। युद्ध में प्राकृतिक संसाधन नष्ट होते हैं और सामाजिक संरचना भी प्रभावित होती है। इतिहास हमें बार-बार यह बताता है, कि युद्ध केवल विनाश का कारक है।
इस स्थान पर संवाद, समझौता, कूटनीति और शांति से समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
युद्ध का मानसिक आघात पीढ़ियों तक जनसाधारण को भुगतना पड़ता है।
युद्ध के विनाशकारी परिणाम को देखें तो युद्ध में सैनिकों के साथ-साथ निर्दोष नागरिक भी मारे जाते हैं और बुनियादी ढाँचे जैसेब विद्यालय, अस्पताल, घर, मॉल आदि भी तबाह हो जाते हैं।
इससे आर्थिक संकट भी आता है।युद्ध में भारी खर्च के कारण महँगाई और गरीबी बढ़ती है, साथ ही विकास रुक जाता है।
इससे पर्यावरणीय क्षति भी है। अंधाधुंध बमबारी से पर्यावरण प्रदूषित होता है, पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो जाता है।
युद्ध के कारण समाज में भय, अविश्वास और स्वार्थ की भावना बढ़ जाती है, जिसके कारण मानवीय मूल्यों का ह्रास होता है।
युद्ध कभी किसी समस्या का समाधान नहीं है, वरन् अनेक विसंगतियों, विनाश और पतन का मार्ग है। इसका विकल्प केवल शांति, सद्भावना, विचार-विमर्श और संधि तथा आपसी समझौता है।