ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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दिन महीना पुराना, साल गुजरा,
कुछ खट्टा-मीठा, भूला-बिसरा।
आओ मनाएं नया, साल आ गया,
कुछ नया करने का मुकाम आ गया।
जो गलती हमसे, पहले हो गई,
जो भी हमारी, मंज़िल छूट गई।
गलती को फिर, से न दुहराना है,
छूटी मंज़िल को, फिर से पाना है।
सिर्फ कोरा वादा, नहीं करना है,
वादा पूरा हो ऐसा, कुछ करना है।
सिर्फ दिन, महीना, साल नहीं गुजरा,
हमारी चाहत और ख़्वाब भी गुजरा।
हमारे मीठे सपने, और अपने भी छूटे,
हमारी उम्मीद और, स्वप्न भी टूटे।
अब कोई भी न टूट पाए, न कोई छूट पाए,
प्राण जाए तो जाए, पर वचन ना जाए।
लक्ष्य को हासिल करो, जिसको तुमने घेरा है,
दो दिन का बसेरा है, दूर होता अंधेरा है।
अबके बरस हमें, कुछ ऐसा करना है,
लोग हमें याद रखें, उनके दिल में रहना है।
भय नफ़रत आतंक, हिंसा से लड़कर नहीं,
प्यार से अपनों के, दिल में राज करना है॥