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‘व्यंग्य’ टिंचर आयोडीन की तरह, जो घाव को ठीक कर देता– श्री नागर

इंदौर (मप्र)।

व्यंग्य टिंचर आयोडीन की तरह है, जो जलन करता है लेकिन वह घाव को ठीक कर देता है। लेखक नंदकिशोर बर्वे एक कथाकार भी हैं, उनकी कहानियों में भी व्यंग्य दिखता है।
साहित्य संस्था क्षितिज द्वारा ख्यात व्यंग्यकार नंदकिशोर बर्वे के नवीन व्यंग्य संग्रह ‘काले धन के बोनसाई’ पर श्री अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय के गोष्ठी कक्ष में आयोजित पुस्तक चर्चा में वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर ने यह बात कही।
वरिष्ठ व्यंग्यकार जवाहर चौधरी ने पुस्तक पर कहा कि व्यंग्य लेखन बहुत आसान काम नहीं है। क्रोध से व्यंग्य का जन्म होता है। लेखक बिना किसी शोरगुल के समाज में व्याप्त विसंगतियों को शिष्टता से सामने लाते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल ने कहा कि व्यंग्य परम्परा अत्यंत प्राचीन है। व्यंग्यकार समाज सुधारने के लिए संकेत देता है, इसलिए प्रत्येक व्यंग्यकार समाज सुधारक होता है। लेखक की कृति में समयबोध स्पष्ट झलकता है और समाज में हो रहे हो सामाजिक मूल्यों की बुराइयों पर लेखक ने शिष्ट प्रहार किए हैं। कृति पठनीय है।
अतिथियों का स्वागत अश्विनी कुमार दुबे और श्री बर्वे द्वारा किया गया।
संचालन श्रीमती रश्मि चौधरी ने किया। सुरेश रायकवार ने आभार माना।