सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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‘स्वयं प्रेम स्वार्थ है या जरूरी’, यह विषय हमें सोचने के लिए मज़बूत करता है, कि क्या हम मशीन बनते जा रहे हैं। कई तो अपने काम में इतने व्यस्त हैं, कि उनके पास अन्य किसी काम के लिए समय नहीं, पर इसका प्रभाव परोक्ष रूप से उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है ।
मेरे विचार से अपने लिए समय निकालना उतना ही आवश्यक है, जितना भोजन। इसे स्वार्थ कहना तो किसी दृष्टि से उचित नहीं है। “अति सर्वत्र वर्जयेत”, यानी अधिक समय यदि अपने ऊपर व्यय किया तो व्यक्ति अपने कर्तव्यों से वंचित रह जाएगा, जो उचित नहीं है। जैसे स्त्रियों के पास समय नहीं, उसी तरह पुरुषों के पास भी नहीं रहता है। ऑफिस के बाद घर आकर ज़िम्मेदारियाँ भी देखनी होती हैं, पर अपने विवेक और सूझबूझ से समय का तर्कपूर्ण विभाजन किया जा सकता है।
जिन्होंने अभी तक इस पर नहीं सोचा, उन्हें सोचना चाहिए और अपनी रुचि के अनुसार कुछ समय अपने लिए निकालना चाहिए।