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स्वार्थ से विरत होकर ही सुखमय जीवन की कल्पना संभव

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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आज के भौतिकवादी जिजीविषा के दलदल में फंसी भागम-भाग की जिंदगी में एक यह यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है कि ‘पारिवारिक जीवन कैसे सुखमय हो ?’
परिवार का अर्थ वह गोवर्धन पर्वत सम छत्र है जिसमें सभी परस्पर प्रेम,सौहार्द,सहयोग,सुख-दुःख के साथी,सहानुभूति,सहनशीलता,और संवेदनशील और एक-दूसरे की चहुँमुखी प्रगति,विकास,उत्थान और अनवरत संघर्ष में साथ हो। अत: पहले हमारे देश में एकसाथ समन्वित संयुक्त परिवार की व्यवस्था थी। घर के अनुभवी पुरुष या स्त्री बुजुर्गों के दिशा-निर्देश में समस्त पारिवारिक सदस्यों के समुचित सामाजिक,नैतिक,बौद्धिक,सांस्कृतिक, शैक्षणिक पुरुषार्थ और परमार्थ-इन सभी क्षेत्रों में विकास और सबलता होती थी। एक-दूसरे की सफलता में खुशियाँ और दु:ख-आपदाओं में संवेदनाओं और सहयोग का साथ होता था,किन्तु शनै:-शनै: संसाधनों की कमी,जनसंख्या में लगातार वृद्धि,सांसारिक मृगतृष्णा में अनवरत ऊफ़ान के अन्तर्मन भावों ने मनुष्यों की सार्वजनिक सहयोगी बन्धुत्वभाव चिन्ता को एकाकी या व्यक्तिगत बना
दिया। धन वैभव,पद,राजनीतिक सत्ता,ज़मीन, अट्टालिकाओं की आकाशवत अनंत चाहत ने
उसे स्वार्थ में इतना अंधा बना दिया है कि ऐश्वर्य, मान आदि के लिए साम,दाम,दण्ड,भेद,सन्धि,शत्रुता, नफ़रत,दंगा,हिंसा,छल,मुफ़्तखोरी,बेईमानी और ज़लालतों को सहने वाला ज़लील दानवीर शैतान बना दिया है। समस्त सामाजिक,सांस्कृतिक मानवीय मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों से विरत समस्त सहोदरीय और सामाजिक अनुबन्धीय रिश्तों के माधुर्य और समरसता सह अपनेपन को स्वार्थी मानव ने आज २१वीं सदी के प्रारंभिक काल में तार-तार और कलंकित कर दिया है। पुरुषार्थ और परमार्थ धर्मार्थ न रहकर बस नश्वर स्वार्थ में परिवर्तित हो गए हैं। परस्पर सहयोग,प्रेम,त्याग, न्याय,नीति-रीति,अनवरत चाहत के दावानल में ज्वलित होती गई है। ‘अयं निज: परो वेति गणना’ अब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की विश्वबन्धु की गरिमा पर भारी पड़ चुकी है। गेहूँ का वर्चस्व गुलाब पर स्थापित हो चुका है। सम्बन्धों की मर्यादा और ईश्वर पर विश्वास टूटती जा रहा है। ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ की मानवतावादी और परोपकारी सोच जो परिवार की खुशी,शान्तिमय मुस्कान का आधार थी,अब ध्वस्त हो गई है। बड़े-बुजुर्गों-माता- पिता के प्रति सम्मान और सेवाभाव समाप्त से हो गए हैं। अत: जब तक मनुष्य इस स्वार्थी मायाजाल से विरत हो संवेदनशील,परमार्थी,अपनापन,प्रेम- त्याग-शील गुण और कर्म से समन्वित नहीं होता, तब तक परिवार में सुखमय जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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