राधा गोयल
नई दिल्ली
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हमारे शरीर की समस्त चेष्टाओं का संचालन मस्तिष्क द्वारा होता है, जिनमें अग्रणी है बुद्धि बल। इस बल के आगे सभी बल फीके पड़ जाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहाँ शारीरिक बल पर बुद्धि ने विजय पाई। बुद्धिमान लोगों ने अपने बुद्धि बल से साम्राज्यों के उत्थान पतन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
माना, कि शारीरिक बल भी आवश्यक होता है, किंतु यदि बुद्धि न हो तो शारीरिक बल भी परास्त हो सकता है। वैसे तो बुद्धि बल के अनेक उदाहरण हैं:- जैसे श्री गणेश, श्री विष्णु, श्री कृष्ण आदि जिन्होंने शारीरिक बल से अधिक बुद्धि के बल पर विजय प्राप्त की। आज श्री कृष्ण के विषय में-
◾सभी जानते हैं कि जरासंध कितना शक्तिशाली राजा था। उसे हराना आसान नहीं था। श्री कृष्ण ने अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए उसे भीम द्वारा मौत के घाट उतरवाया। उसे गदा युद्ध के लिए चुनौती दी। कृष्ण जरासंध के जन्म का रहस्य जानते थे और यह भी जानते थे कि उसे किस तरह से मारा जा सकता है। इसी लिए, उन्होंने तिनके को चीरकर भीम को इशारा किया कि जंघा को चीरकर विपरीत दिशा में फेंको। भीम ने वैसा ही किया। उसकी जंघा दबाकर उसका शरीर बीच से २ टुकड़ों में चीर दिया और दोनों दिशाओं की ओर उछाल दिया, किंतु वह फिर जुड़ गया। ऐसा दो-तीन बार हुआ। तब कहीं जाकर भीम को कृष्ण का इशारा समझ आया और उसने जरासंध के शरीर को चीरकर विपरीत दिशाओं में फेंका एवं जरासंध का वध किया।
◾कालयवन को मारना आसान नहीं था। उसे भी यह वरदान मिला हुआ था कि वह किसी ऋषि के अलावा किसी के द्वारा भी नहीं मारा जा सकता। कृष्ण ने कालयवन को ललकारा और सेना साथ न लेकर अकेले बिना युद्ध किए आगे-आगे दौड़ पड़े, कालयवन उनके पीछे-पीछे। कृष्ण जाकर ऋषि मुचुकुन्द की गुफा में छिप गए। ऋषि हजारों वर्षों से तपस्या में लीन थे। कृष्ण उनका पीतांबर ओढ़ कर चुपके से ऋषि के पीछे छिप गए। कालयवन ने सोचा, कि यह कृष्ण पीतांबर ओढ़ छिपा बैठा है। उसने बहुत जोर से पीतांबर खींचा और ऋषि को एक लात मारी। ऋषि ने क्रोध से अपनी आँखें खोली और आग्नेय नेत्रों से कालययवन को देखा। कालयवन फौरन उनकी आँखों की ज्वाला से भस्म हो गया।
◾महाभारत का युद्ध हुआ, तब भीम का पोता बर्बरीक युद्ध में लड़ने के लिए आया। रास्ते में श्री कृष्ण मिले। जब कृष्ण को पता लगा कि बर्बरीक भीम का पोता है तो उन्होंने उससे पूछा कि वह किसकी तरफ से युद्ध करेगा। उसने बताया कि उसकी माता ने कहा है, कि जो पक्ष कमजोर होगा, उसकी तरफ से युद्ध करना। बर्बरीक के तरकश में केवल ३ तीर थे। कृष्ण ने कहा- “तुम्हारे तूणीर में केवल ३ तीर हैं। इनसे किस प्रकार से लड़ाई करोगे ?” उसने बताया कि मेरा तीर शत्रु को भेद कर वापस मेरे तूणीर में आ जाता है। कहें तो इसका उदाहरण दूँ ? कृष्ण ने कहा- “दिखाओ”। उसने कहा- “मैं अपने एक ही तीर से इस पीपल के सारे पत्तों को भेद सकता हूँ और उसके बाद यह बाण मेरे तूणीर में वापस आ जाएगा।” कृष्ण ने उससे यह कला दिखाने के लिए कहा। पीपल के एक पत्ते को उन्होंने अपने पैर के नीचे दबा लिया। बर्बरीक ने १ ही तीर से सारे पत्तों को भेद दिया। एक पत्ता जो कृष्ण के पाँव के नीचे था, तीर बार-बार वहाँ लग रहा था। तब बर्बरीक ने कहा कि “१ पत्ता आपके पाँव के नीचे है।” कृष्ण समझ गए कि यदि बर्बरीक ने युद्ध में भाग लिया तो युद्ध किसी भी निर्णय तक नहीं पहुँच पाएगा। तब उन्होंने अपना विशाल स्वरूप प्रकट किया और उससे कुछ दान माँगा। बर्बरीक ने सहर्ष स्वीकार किया। तब कृष्ण ने उससे उसके शीश का दान माँगा। वही बर्बरीक ‘खाटूश्याम जी’ के नाम से पूजे जाते हैं।
◾भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति थे। वे पांडव सेना का बहुत विनाश कर चुके थे। उनको इच्छा मृत्यु का वरदान था। जब तक वो युद्ध से नहीं हटते, युद्ध जीतना असंभव था। तब कृष्ण ने अपनी बुद्धि का उपयोग किया। एक रात युद्ध समाप्त होने के पश्चात कृष्ण द्रोपदी को भीष्म के शिविर में भीष्म से आशीर्वाद लेने के लिए ले गए। भीष्म ने आशीर्वाद दिया ‘सौभाग्यवती भव’। कृष्ण बाहर ही खड़े थे। फौरन अंदर आए और कहा “पितामह! यदि आप पाण्डव सेना को इसी प्रकार से मारते रहे तो आपका यह वरदान तो निष्फल हो जाएगा। आपको तो इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ है।” तब भीष्म ने बताया कि यदि कोई स्त्री उनसे युद्ध करेगी तो वह उस पर शस्त्र प्रयोग नहीं करेंगे। श्री कृष्ण को रास्ता मिल गया। उन्होंने अगले दिन अर्जुन के आगे शिखंडी को खड़ा किया, जिसकी वजह से भीष्म शस्त्र नहीं चला पाए। अर्जुन ने शिखण्डी की आड़ लेकर पितामह को वाणों से बींध दिया।
◾भीष्म पितामह के बाद गुरु द्रोण कौरव सेना के सेनापति बने। उन्होंने भी पांडव सेवा का बेहद विनाश किया। चक्रव्यूह की रचना की। अर्जुन उसे तोड़ना जानता था। द्रोण ने राजा सुशर्मा को यह आदेश दिया कि वह अर्जुन को ललकारता हुआ युद्धभूमि से इतनी दूर ले जाए कि अर्जुन संध्याकाल से पहले न लौट सके। उससे लड़ाई ना करके ललकारते हुए सुशर्मा पीछे हटता जाए। सुशर्मा ने ऐसा ही किया। अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदना तो आता था, लेकिन बाहर निकलना नहीं आता था। जयद्रथ ने चक्रव्यूह की इस प्रकार से नाकेबंदी की हुई थी कि पांडव सेना किसी प्रकार से भी उस व्यूह में नहीं घुस पाई। अर्जुन वैसे ही बहुत दूर निकल चुका था। शाम को वापस लौटने पर उसको अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार मिला। तब उसने अगले दिन शाम होने से पहले जयद्रथ को मारने की कसम खाई और यह भी कहा कि यदि वह ऐसा नहीं कर पाया तो जलती चिता में अपने प्राण त्याग देगा। तब भी श्री कृष्ण ने बुद्धि बल से जयद्रथ का वध करवाया और अर्जुन के प्राणों की रक्षा की।
◾इसी तरह से श्री कृष्ण ने गुरु द्रोण को भी अपने बुध्दिबल से मरवाया। अश्वत्थामा नाम का एक हाथी था। उसको भीमसेन द्वारा मरवाया गया और भीमसेन कृष्ण का आशय समझकर जोर-जोर से चिल्लाया- “मैंने अश्वत्थामा को मार दिया। मैंने अश्वत्थामा को मार दिया।” श्री कृष्ण जानते थे कि गुरु द्रोण यह बात पूछने युधिष्ठिर के पास अवश्य आएंगे, और ऐसा ही हुआ। जब गुरु द्रोण युधिष्ठिर के पास पूछने आए तो युधिष्ठिर के यह कहते ही ‘अश्वत्थामा हतो’, श्री कृष्ण ने जोर-जोर से नगाड़े बजवा दिए, जिसमें ‘नरो वा कुंजरो’ की आवाज दब गई और द्रोण अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग कर जमीन पर बैठ गए एवं धृष्टध्युम्न ने उनका शीश काट दिया।
◾कृष्ण ने अपनी बुद्धि से कर्ण का वध करवाया। कृष्ण जानते थे, कि कर्ण अर्जुन से अधिक वीर है; साहसी है। कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में धँस गया था। अर्जुन ऐसे समय में उसको मारना नहीं चाहता था। तब कृष्ण ने उसको याद दिलाया कि अभिमन्यु भी अकेला था, निहत्था था। उस निहत्थे बालक को छह महावीरों ने काट डाला। उनमें यह कर्ण भी शामिल था।
कृष्ण के ऐसे एक नहीं, अनेक किस्से हैं, जहाँ उन्होंने साबित किया कि ताकत के साथ-साथ बुद्धि की भी बहुत जरूरत होती है। यदि बुद्धि ना हो तो ताकत हार जाती है।