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अद्भुत सजा राम दरबार

राधा गोयल
नई दिल्ली
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जिस दिन राजतिलक होना था, बना उसी दिन वन का योग,
सत्ता का कोई लोभ नहीं था, कभी नहीं चाहा उपभोग।

इसीलिए तो राज्य को पाकर भी माता का वचन निभाया,
रीत निभाने को रघुकुल की, राम ने वन का वास अपनाया।

राजतिलक होना था जिस दिन, उसी दिवस वनवास था पाया,
वैरागी के मन में राज्य के प्रति, नहीं थी कोई मोह-माया।

लक्ष्मण ने भी साथ में जाकर, अपना भ्राता धर्म निभाया,
सीता जी ने साथ में जाकर, अपना पतिव्रत धर्म निभाया।

जिस सुत की खातिर कैकेयी ने, राम के लिए वनवास था चाहा,
उस सुत ने भी सत्ता की चाहत को, पैरों से ठुकराया।

महलों के सुख त्याग भरत ने, नंदीग्राम में किया निवास।
आज राम आ गये अयोध्या, पूरन हुई सभी की आस।

राम तुम्हारे अमर त्याग को भूल नहीं सकता इतिहास।
महलों का मधुमास छोड़कर, अपनाया वन का वनवास।

भरत तुम्हारे अमर त्याग को, भूल नहीं सकता इतिहास,
महलों का मधुमास छोड़कर, नंदीग्राम में किया निवास।

चौदह वर्ष वनवास काटकर आए अवधपुरी प्रभु श्री राम,
अम्बर में बज उठे नगाड़े, जय श्रीराम जय जय राम।

सियाराम सिंहासन सोहें, अद्भुत सजा राम दरबार।
बगल में तीनों भाई संग हनुमत, लोग कर रहे जय-जयकार।

चौदह वर्ष के बाद अवध में सिया संग आए हैं राम,
अब वो केवल राम नहीं हैं, आज बन गये प्रभु श्रीराम।

झूम के सारे नाचो गाओ, जय-जय गाओ बारम्बार,
अद्भुत सजा राम दरबार, अद्भुत सजा राम दरबार॥