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अपना-पराया

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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दिल सच्चा हो अगर, उसका सब अच्छा होता,
ईश्वर पर हो भरोसा, उसका सब अच्छा होता।

दिल में हो मुहब्बत, अगर तो कष्ट नहीं होता,
ईश्वर पर भरोसा, कोई काम अधूरा कहाँ होता।

अजब यह दुनिया है, कोई सच्चा नहीं होता,
कृष्ण मिल जाए जग में, इन्सान सच्चा न होता।

मन में होता है मेरा कोई अपना भी होता,
रिश्तेदार बहुत हैं, पर कोई अपना नहीं होता।

धन-दौलत अगर घर में हद से ज्यादा होता,
प्यार थोड़ा भी मिल जाए तो ज्यादा होता।

उम्र सब घटती रही, हमारी समझ कहाँ होती,
राहों में मिलते बहुत, मगर प्यार कहाँ होता।

आज दुनिया को पता है, पराया कर के छोड़ा,
अपना जिसे भी मैं बोलूँ, अपना मेरा नहीं होता।

कर मोहब्बत, तो जमाने में खुद से कहा होता,
अपनों को बुलाने से पहले कृष्ण को बुलाया होता।

कैसे किसी को अपना मान लें ‘ऋतंभरा’,
धोखा मिला मुझको, कोई सच्चा कहाँ होता॥