हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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धर्म की उस लौ को फिर जलाया जाना चाहिए, क्योंकि वर्तमान समय में रिश्तों में दरार है। रिश्तों में बढ़ती खटास को मिटाने के लिए हमारी अपनी वह भारतीय संस्कृति व परंपरा का दौर फिर लाने हेतु सामाजिक स्तर पर आगे आने की जरूरत आन पड़ी है, क्योंकि इस समय जो भी बुराइयाँ पनप रही है, उस नकारात्मक प्रवाह की कड़ी को तोड़ कर हम सभी को अब नवसृजन के बीजों को बोना बहुत जरूरी है। जाति-धर्म, समाज के मतभेद को भूल कर राष्ट्र धर्म का पालन करना आज समय की आवश्यकता है। आधुनिकता की इस चकाचौंध में इन्सानियत मिट रही है। दया, करुणा सबके सब अति का शिकार हो चुके हैं। इसलिए तड़पते इंसान का शरीर मरणासन्न पड़ा रहता है और खुदगर्ज मनुष्य उसे जमाने के तराजू में तौलता है एवं मोबाइल के कैमरे में कैद करता है, लेकिन उस घायल को अस्पताल नहीं पहुंचाता है। इंसान के अंदर परोपकारी भाव मर से गए हैं। इसलिए, अब सभी को सामाजिक ताने-बाने को चैतन्य अवस्था में सामने लाना ही होगा। धर्म व समाज की भारत की अपनी एक अलग पहचान है, क्योंकि हमने तो गैरों को भी अपने गले लगा कर अपना बनाया है। ऐसे ही नहीं कोई सनातनी परंपरा व बुद्धि कौशल के बल पर साधु-संतों की धरती वाले देश को दुनिया विश्व का सिरमौर कहती। विकासशील देशों में भारत आगे बढ़ रहा है, तो इसका घमंड नहीं होना चाहिए। हम सभी विभिन्न जाति-धर्म समाज में जरूर हैं, पर दुनिया के लिए हम ११४ करोड़ भारतीय ही हैं। दुनिया में हमारा देश युवा देशों में अव्वल है। इसलिए, पुराने समय की वह बातें कभी भी हमारे लिए पुरानी नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमारी नींव मजबूत है और हमारे बड़े-बुजुर्गों ने हमें जो मार्गदर्शन दिया है, उसे नजर अंदाज नहीं करें। हम सभी जिम्मेदार बनें। सही-गलत का फैसला हम स्वयं करें। दु:ख-तकलीफ में इन्सान के लिए हम आगे बढ़ कर मददगार साबित हों। इंसान को अपने जमीर को कभी भी नहीं बेचना चाहिए, धन-दौलत तो हाथ का मैल होता है लेकिन भलाई करने से उसकी कई पीढ़ियाँ तर जाती है। सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक सांस्कृतिक के तहत भला करने वाले का कभी भी बुरा नहीं हो सकता है, क्योंकि ईश्वर के घर देर जरूर है, पर अंधेर नहीं है। इन्सान को फरेब, धोखे व झूठ से बचाव करते रहना चाहिए, क्योंकि ज़िंदगी की इस गाड़ी का भरोसा तो पल का ही नहीं है, फिर बरसों की सोचने से क्या होने वाला है। एक कवि ने सही कहा कि “कोई ऐसी जगह बता, जहां मेरा ईश्वर ना हो।” हर स्वरूप में उसकी उपस्थिति है, पर इसके लिए हमें सकारात्मक ऊर्जा के साथ सच्चाई के रास्ते पर चल कर हमें अपनी इंसानियत के फ़र्ज को निभाना ही होगा। इसे कभी भी नहीं भूलना चाहिए।