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अहंकार से नहीं जीता जा सकता युद्ध

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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पश्चिम एशिया की धरती की तपती रेत पर जो युद्ध आरंभ हुआ था, उसके पीछे चंद घंटों में विजय का स्वप्न सत्ता पक्ष के सामने प्रस्तुत किया गया था। एक निश्चित विजय का निर्णायक परिणाम और फिर विजय नाद के साथ घर वापसी, परंतु इतिहास गवाह है कि वह अहंकार को शीघ्र क्षमा नहीं करता है। आज वह युद्ध दूसरे महीने में प्रवेश करके आगे खिंचता जा रहा है। उसके साथ-साथ पूरे विश्व के सामने उस सत्ता की नग्न असहायता भी दिख रही है, जो स्वयं को समस्त विश्व का नियंता समझता रहा है ।
डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस युद्ध को शक्ति प्रदर्शन का मंच समझ कर शुरुआत की थी, वह अब उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल की तरह दिखाई पड़ रही है। हाल ही में उन्होंने ईरान के लिए अशिष्ट और भड़काऊ भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा है “स्ट्रेट खोलो, वरना नरक में रहोगे।“ इसके साथ ही धमकी देते हुए किसी तरह का कूटनीतिक संयम नहीं दिखाया।
यह युद्ध एक ऐसी जिद का परिणाम है, जहाँ विवेक की जगह अहंकार से निर्णय लिया जाता है। इन्होंने यह सोच लिया है कि राष्ट्रों से उनके शीर्ष नेतृत्व को हटा कर सत्ता परिवर्तन किया जा सकता है । वेनेन्जुयेला में सत्ता परिवर्तन कर वह अति उत्साही हो गए, परंतु ईरान की राजनीतिक संरचना बहुस्तरीय और सामाजिक आधार गहरा है, जो किसी एक प्रहार से नहीं टूट सकता। इसके विपरीत उन पर किए गए हमलों ने उनके अंदर प्रतिरोध की ज्वाला को धधका दिया। आज स्थिति यह है कि ट्रम्प अपने ही बनाए हुए चक्रव्यूह में फँस गए हैं ।
सहयोगियों का प्रश्न इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना है। ‘नाटो’ देश इस युद्ध का साथ देने के लिए तैयार नहीं, जिसका उद्देश्य ही स्पष्ट नहीं। अमेरिका इस युद्ध में अकेला खड़ा है। यदि बाहरी समर्थन का अभाव एक संकट है, तो देश की आंतरिक अव्यवस्था उससे भी गहरा संकट है।
युद्ध के बढ़ते दबाव के कारण प्रशासन के अंदर अविश्वास और अस्थिरता गहरा गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य में निरंतर बाधित व्यापार ने इस युद्ध को वैश्विक संकट में बदल दिया है। इस युद्ध की आग अब उन देशों तक पहुँच रही है, जो प्रत्यक्ष रूप से इस युद्ध में शामिल नहीं हैं ।
इस समय ट्रम्प के सामने सबसे बड़ी समस्या है, कि इस युद्ध से बाहर कैसे निकलें। वे ना तो इसे निर्णायक रूप से जीत सकते हैं और ना ही बिना राजनीतिक नुकसान के छोड़ सकते हैं। यह युद्ध विजय की ओर नहीं, वरन् थकावट की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है ।
जब इस युद्ध का धुआँ छटेगा, तो यह स्पष्ट रूप से समझ में आ जाएगा कि युद्ध अहंकार से नहीं, वरन् समझदारी से जीता जाता है।