नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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लौटने की आस में देखूँ तुम्हारे इशारे,
जबसे तुम गए हो, मैंने दिन-रात रो-रो कर गुज़ारे
रात बिताते गिन-गिन तारे।
लौटने की आस में करूँ इंतज़ार तेरा,
अब नहीं लौटकर आने वाले
घर छोड़ कर जाने वाले,
अब तुम सदा के लिए चले गए
लेकिन मैं इंतज़ार करूँ सिर्फ तेरा।
तुम्हारे फिर कभी रूप बदल कर आने का,
लौटेंगे कभी रूप बदल कर ही सही
बादल छाने से सूरज का अस्तित्व खत्म नहीं होता,
तुम मेरे थे, मेरे ही रहोगे हर जन्म में
तुम दूर हो, मगर अहसास पास रहता हर पल तुम्हारे।
तुम्हारे इशारे मन को फिर रिझाते,
तुम्हारे इशारे मुझे रंगीन सपने दिखाते
तुम्हारे इशारे नई-नई वादियाँ करते आकर सपनों में,
तुम्हारे इशारे भी खाली जगह भर देते-जैसे कसमें
जिसमें प्रेम लौट आता है पास मेरे,
प्रेम लौटता ही है वापस मेरे।
नि:स्वार्थ भाव से किया गया प्रेम,
करुणा, दया व्यर्थ कभी नहीं जाते
यह ऊर्जा एक नए रूप में वापस आती ज़रूर से,
यही जीवन को आधार और सार्थकता देते।
दिया हुआ प्रेम एक बीज के समान होता,
फल देगा ही कभी न कभी, हमेशा की तरह
प्रेम को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए,
यह आपके समृद्धि और शक्ति का आधार होता
प्रेम ही जीवन का आधार होता,
यह वह शक्ति है जो रिश्तों को जोड़ती।
मैं लिखती हूँ खुद को पढ़ने के लिए,
क्योंकि जब भी तुम्हें सोचती हूँ, लगता है पास हो मेरे
तुम मेरे सपनों में ही समाए रहते हो,
मेरी साँसों में समाए रहते हो, हमेशा की तरह।
जीवन की कला सिखाकर तुमने मुझे पूरी तरह जीना सिखाया,
तुम्हारे नयनों में ही मैंने अपना घर बनाया।
तुम रहे या ना रहो, तुम रहते हर पल साथ मेरे,
लौटने की आशा में देखूँ तुम्हारे इशारे॥