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आहिस्ता-आहिस्ता

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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आहिस्ता-आहिस्ता ही प्रेम का दीपक जलता है,
अपने ही संस्कार मन को पावन करता है।

मन में प्रेम रहे तो सारी दुनिया प्रेममयी लगती है,
हर दु:ख जीवन में नई-नई राहें बनाता है।

नई उमंगों का आगमन ही जीवन है,
आहिस्ता-आहिस्ता ही फूलों-सा खिलने लगता है।

संघर्ष ही जीवन को आगे बढ़ना सिखाता है,
आहिस्ता-आहिस्ता ही जीवन में खुशियाँ लाता है।

हर दिन सफल हो और समृद्धि से जीवन भर जाए,
जीवन में खुशियों की बहार लाता है।

ज़िंदगी कह रही है यही- आहिस्ता-आहिस्ता चलो,
चौराहे ही जीवन में आगे बढ़ना सिखाते हैं।

ज़मीन पर पैर हों, हौसला छुए आसमान,
ऐसे ऊँचे रखो हमेशा अपने विचार।

दृढ़ संकल्प-शक्ति ने कामयाब किया,
आज मुझे यह दुनिया दिखा, जैसा चाहा-बना सके वैसा।

आहिस्ता-आहिस्ता ही चाँद गगन में चलता है,
वैसे ही मानव अपने जीवन में
आहिस्ता-आहिस्ता ही उन्नति करता है।

वृक्ष फल देते समय पर ही, चाहने से कुछ नहीं मिलता,
दोनों मन में रखो-फल समय पर ही देगा।

संघर्ष और धैर्य के बल पर ही
मैंने भी एक बड़ा स्कूल खोला
आज वह ४५ साल का हो गया,
चलकर आहिस्ता-आहिस्ता।

मेरे जीवन में भी खुशियाँ आईं
आहिस्ता-आहिस्ता।
सब कुछ मिलता है, धीरज रखो-
आहिस्ता-आहिस्ता॥