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कब तेरी मंजिल आ जाए…!

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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ज़िंदगी का हर एक पल कीमती है,
फिर बरसों की तू क्यों सोचता है ?
चार दिन के इस सफ़र में,
कब तेरी मंजिल आ जाए, किसे पता..!

फिर भी तू क्यों भटक रहा है ?
माया-मोह व लालच के फरेब में
वर्तमान को जी ले आनंद व उल्लास से,
कब तेरी मंजिल आ जाए, किसे पता..!

सफ़र ही तो जीवन का सार है,
चलना ही तेरा काम है तू रुक मत।
क्योंकि नदिया भी बहती है अविरल तू चल,
कब तेरी मंजिल आ जाए, किसे पता…!!