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किसे यक़ीन था…

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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मुझे पता है कोई
ठहरता नहीं किसी के पास,
रुक जाता है कुछ पल के लिए
साथ देता हैं चंद कदमों तक…।

फिर भी न जाने मन
भागता है उस ओर शायद,
ये सोचकर कि अचानक मिल जाए
वो कभी किसी मोड़ पर…।

पथिक हैं सब जीवन पथ के
अलग-अलग है आप-बीती,
कैसे किस पर विश्वास करें
जब बिछे हैं हर ओर संदेह के जाल।

किसे खबर थी किसे यक़ीन था,
एक दिन टूट जाएगा यह मायाजाल।
रह जाएंगी कुछ खट्टी-मीठी यादें,
झूठे वादे, बिखरे सपने और प्रेम का भ्रमजाल॥