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क्या लिखें ?

संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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क्या लिखें, कैसे लिखें,
किस बात पर लिखें
रोज-रोज अख़बारों की सुर्खियों
इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया,
सोशल मीडिया और लोगों की बातें
सुन, पढ़ और सोच-सोच कर,
मन मेरा सुन्न हो जाता है।

मासूम-सी गुड़ियों से लेकर,
उम्र दराज महिलाएँ भी
नहीं छूटतीं दरिंदों के शिकंजे से,
किंतु छूट जाते हैं दरिंदे बेख़ौफ़
उनके छूटने का जश्न मनाया जाता है,
और मन मेरा सुन्न हो जाता है।

परदेश में स्वधर्म का एक इंसान,
किसी गलतफहमी का शिकार होता है
तब आक्रोश का आतंक फैल जाता है,
वहीं मेरे ही देश में मेरा देशवासी
स्वधर्मी कसाइयों के हाथों,
कत्ल किया जाता है
छूट जाते हैं कसाई भी,
उनके छूटने का जश्न मनाया जाता है
और मन मेरा सुन्न हो जाता है।

ख़ून-पसीने की गाढ़ी मेहनत से,
उगाई फसल जब बर्बाद हो जाती है
बर्बादी का मुआवजा मांगने जब किसान,
सरकार दरबार का दरवाजा
खटखटाता है तो गोलियाँ चलती है,
अनाज पैदा करने वाला आत्महत्या करता है
उनके मरने का भी जश्न मनाया जाता है,
और मन मेरा सुन्न हो जाता है।

सरकारी सस्ते स्कूल बंद किए जा रहे हैं,
ग़ैर सरकारी महँगे स्कूल खोले जा रहे हैं
गरीब का बच्चा पढ़ने से वंचित रह जाता है,
कहीं से कोई आवाज़ उठाता है
उसकी आवाज जेल की सीखचों से
सिलकर दबायी जाती है,
लगाया जाता है ग़द्दारी का झूठा लेबल
देश के गद्दार खुले छूटकर जश्न मनाते हैं,
उनके छूटने का जश्न मनाया जाता है
और मन मेरा सुन्न हो जाता है।

प्रजासत्ताक देश में सत्ता हथियाने,
साम दाम दंड भेद नीति कूटनीति से
छल-कपट कर सत्ता हासिल करते हैं,
सत्ता पाने वाले भ्रष्टाचार को शिष्टाचार
समझकर देश की मलाई खाते हैं,
प्रजा, जो राजा होकर भी भूखी-नंगी रह जाती है,
उनके भूखे-नंगे होने का जश्न मनाया जाता है
और मन मेरा सुन्न हो जाता है।

कुपोषित बच्चे, पीड़ित जनता,
नेताओं के रहमों-कर्म पर पलती है
हाथों को कोई काम नहीं,
युवा बेरोजगार घूमता-फिरता है
कुंठित जीवन जीते जीते,
अवसाद का शिकार हो जाता है
मरीज़ों की बढ़ाती आबादी के लिए,
डॉक्टरों की तादाद की बड़ी कमी है
नए मेडिकल कॉलेज खुलने पर,
बेअक्ल आंदोलन किया जाता है
मेडिकल कालेज बंद करने पर,
बेवकूफों की तरह बड़ा जश्न मनाते हैं
और मन मेरा सुन्न हो जाता है।

देश की सांस्कृतिक धरोहर,
प्रजा की आस्था का ठिकाना
जहाँ हर कोई अपने ख़ुशहाली की,
मत्था टेक कर मन्नत माँगता
वहीं धरोहर परदेशी आक्रांता,
प्रजा की हत्या करके
देश का ख़ज़ाना लूट ले जाता है,
उसी बात का लोग जश्न मनाते हैं
और मन मेरा सुन्न हो जाता है।

विदेश से अनाज लाया जाएगा,
भारत का किसान भूखा मर जाएगा
खेत का बैल और शेयर का बुल मर जाएगा,
सोना खाने वाला मीडिया राजा ईंडिया में आएगा
खेत की हर मेड़ पर भूख की आग सुलगाएगा,
ये सब सोच-सोचकर मेरा मन सुन्न हो जाता है।

प्रजा सत्ताक देश में प्रजा बेहाल है,
फाईलों के ढेर में चीखें दबी पड़ी हैं
इंसानी गिद्ध मासूम माँस नोच रहे हैं,
हिजड़ों-दल्लों के रंग परवान चढ़े हैं
सारे मर्द बेहाल हैं, कसी उनकी नकेल है,
पतिव्रताएँ भूखी मर रहीं और
छप्पन भोग लगाए चरित्रहीन है,
यह सब तमाशा देखकर
मन मेरा सुन्न हो जाता है।

दुनियाभर की फाईलों की,
परत-दर-परत खुलती जा रही है
एक-एक शख्सियत की असलियत,
परत-दर-परत खुलते जा रही है
ना जाने कहाँ ये दुनिया जा रही है,
धन दौलत सत्ता पॉवर के बल पर
मासूमों की जान की कीमत।
मुर्गी के अंडे से भी कम मानी जाती है,
ये सब देख सुनकर मन सुन्न हो जाता है॥