ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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गाली खाना गाली देना है, यहाँ की तो रीत पुरानी,
शान है ये पुश्तैनी जब, बात-बात पर देते हैं गाली।
बिना गाली थाली खाली, जैसी होती इनकी दीवाली,
छोटे बच्चे भी बड़ों से कम नहीं, शान को बढ़ाए गाली।
चार-पाँच की संख्या में, मिलकर सब सिगरेट हैं पीते,
खुद को समझें राजा, बाबू जैसे जीवन है जीते।
कुछ को जब शर्म है आती, हाथ पीछे नौ-दो ग्यारह होते।
कुछ को नहीं शर्म होती, सिगरेट का बस कश लगाते।
ये घर में नहीं हाथ बँटाते, माता-पिता चाहे परेशान होते,
चेहरे पर शिकन नहीं आती, पीढ़ी की शान घटा न पाते।
दिन-रात इसी सोच में रहते, मौका मिला कि मारे चाकू,
जीवन चाहे सारा जेल बिताए, सोच इनकी बड़ी लड़ाकू।
इसी बात की टोह में रहते, जब किसी से बदला लेना है,
उनसे दोस्ती और उन्हीं से दुश्मनी, गिरगिट-सा रंग बदलना है।
तम्बाकू खाते बड़े चाव से, जैसे कि प्रसाद बांटते,
बिना जान-पहचान के भी, तम्बाकू से पहचान बढ़ाते।
सब जानें तम्बाकू है इक जहर, खाते इसे आठों पहर,
सब आदत से हैं लाचार, अब तो समझो इसका कहर।
मेरे प्यारे सज्जनों, अब तो खुद को संवार लो,
छोटी-सी है ज़िंदगी, खुद को खुद से जान लो॥