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गली-गली धुंध

आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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गाँव-गली, शहर-नगर तक छाया धुँआ-धुँध,
ठंडे में सन्नाटा पसरा, प्रदूषित ओस की बूँद
रुकी रफ्तार ट्रक, बस, कार की, धुंध आँखें मूंद,
कश्मीर-हिमाचल की ठंड को छोड़ो बर्फबारी अंधाधुंध।

ठिठुरन-जकड़न में जन जीवन, आँखें हुई है कुंद,
शीतलहर से सभी त्रस्त थे, खेल रहे हैं बाल मुकुंद
खेतों में हरियाली आई, सरसों पीले फूल के झुंड,
चाय की नुक्कड़ के जमघट बहुबात अतार्किक सूंड।

चाय की चुस्की लेता खड़ा मैं ऐसा लगे हाथ-पैर हों सुन,
जलती सिगड़ी पास पड़ी थी, गप्पे राजनीति की धुन
मोदी-योगी की चर्चाएं अंधाधुंध, राहुल पर पड़े थे घुन,
ठंडक में बातों की गर्मी, एहसास करा दे गर्मी जून।

चाय-कचोरी-भजिए की छोटी दुकान पर भीड़ में लेते सबको मूढ़,
चट्टी-नुक्कड़ पर जल रही आग- अलाव बैठे, युवा, बुजुर्ग व बूढ़,
युवाओं की बातें नये जमाने की, सुन बूढों को अंदर-अंदर कुढ़,
चुप्पी मार के आग तापते बुड्ढे, इन बच्चों को समझे विमूढ़।

ठिठुरते गरीब-निर्धन को दान कम्बल कर पुण्य वसूल,
गरीबों बच्चों को देखो, कपड़े गर्म उन्हें देना न जाना भूल
अपने हिस्से के कुछ दान से जीवन तृप्त समूल,
ईश्वर प्रेम,साधना, तपस्या से मिलेंगे आशीर्वाद के फूल !!

घना हो कुहरा जीवन ठहरा, कृषक के बड़े उसूल,
लेह-लद्दाख पर खड़े सैनिक लिए बंदूक त्रिशूल।
जीवन के उद्देश्य के बिना, जीवन स्वयं का शूल,
जैसी जिनकी अनुभूति, ठंडक चुभे हड़ मूल॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”