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चाय गुणकारी, औषधिय पर्याय

आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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चाय का अद्भुत है पूर्व इतिहास,
चीन से शुरू ४००० वर्ष है खास
भारत में अंग्रेजों का चाय इतिहास,
बहुत नया २०० साल है परिहास।

चाय की गुणवत्ता में भारत है विख्यात,
चाय में दूध की मिलावट में भारत प्रख्यात
वैसे ! अंग्रेजों ने भारत में लाल चाय की शुरुआत,
बंगाली दादा ने बताई चाय में दूध की बात।

इससे स्वाद-पेय से अंग्रेजों के आती मजे की याद,
तब से प्रचलित हुआ दुनिया में दूध की चाय का स्वाद
भारत के चाय-दूध की दुनिया को लगा मनभावन स्वाद,
अंग्रेजों ने असम में चाय खेती शुरू की, है यह अपवाद।

चाय बड़ी गुणकारी, पत्ते औषधिय चमत्कारी,
दूध मिश्रित हो तो चाय हो स्वास्थ्य लाभकारी
व्यक्ति, परिवारों के हृदयाभाव को जोड़ें हो उपकारी,
ईष्ट मित्र, दोस्त, संबंधी, गैर होते सभी चाय पे आभारी।

चाय के प्रचलित विश्व में अनेक हुए प्रकार,
काली चाय, हरी चाय, सफेद चाय, औषधीय चाय, मसाला चाय, नींबू चाय,
हैदराबादी चाय, इरानी चाय, पंच धातु चाय, रूई बोस एप्पल चाय, उलोन्ग चाय,
सभी चाय भारत के जनमानस को है स्वीकार।

चाय जीवाणु रोधी पेय है, हृदयाघात नियंत्रक,
स्फूर्ति, ताजगी देती चाय है, रक्त चाप नियंत्रक
चाय बड़ी गुणकारी मानसिक आघात नियंत्रक,
चाय दवा है, है रोग नाशक जीवाणु नियंत्रक।

चाय पत्तियों की प्रजाति के १५०० से अधिक हैं प्रकार,
दुनिया में महंगी चायपत्ती ‘दा होंग पाओ चाय’ चीन करता तैयार,
भारत में नुक्कड़ में ५ से ४५० रुपए में चाय का व्यापार,
भारत के विलासी होटल ‘ताज’ में १८०० रुपए का चाय आकार।

मेरे देश में घर-घर, गली-नुक्कड़ तक चाय बनती मजेदार,
जिन दुकानों में चाय बिकती वहाँ समझो खड़ी सरकार।
भारत की नहीं, जनता की स्वयं की मर्जी की सरकार,
जिन्हें चाय से होता हो नुकसान, उन्हें पीने की क्या दरकार ??

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”