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‘छोटी चादर’ में बड़ी सोच ही असली ताकत

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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“जिन्हें घुटने मोड़ कर सोना आ गया, उनकी ज़िंदगी में कोई भी चादर छोटी नहीं पड़ सकती।” यह पंक्ति केवल नींद की मुद्रा नहीं बताती, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा दर्शन समझाती है। यह उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने हालातों से लड़ना नहीं, उनके बीच जीना सीख लिया। जिन्होंने शिकायत नहीं, सामंजस्य चुना।

जीवन की ‘महाभारत’ में हमें समझना पड़ेगा कि संघर्ष से उपजी समझ और जीवन हर किसी को बराबर अवसर नहीं देता। किसी के हिस्से में रेशमी बिस्तर आते हैं, तो किसी के हिस्से में ठंडी ज़मीन होती है। जिन लोगों ने कम साधनों में जीना सीखा, उन्होंने ज़रूरतों को सीमित करना और इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख लिया, यह उनकी शक्ति बनती है। पहले घुटने मोड़कर सोना मजबूरी से शुरू होता है, लेकिन धीरे-धीरे वह आदत बन जाती है-और फिर वही आदत ताकत बन जाती है।
ऐसे लोग जानते हैं कि हर दिन आराम नहीं मिलेगा, हर रास्ता सीधा नहीं होगा। इसलिए वे अपने आपको मोड़ना यानी समझना सीख लेते हैं, पर हालातों को कोसते नहीं हैं। यही लचीलापन उन्हें टूटने से बचाता है।
सुविधाओं की दुनिया और असंतोष से भरी इस दुनिया में दूसरी तरफ वह वर्ग भी है, जिसे जीवन ने बहुत कुछ सहज ही दे दिया-बड़ा घर, नरम बिस्तर, लम्बी चादरें, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वहाँ भी नींद अक्सर अधूरी रहती है। चादर लम्बी होती है, फिर भी पैर बाहर निकल ही जाते हैं। सुविधाएँ बढ़ने के साथ अपेक्षाएँ भी बढ़ती जाती हैं, और उसी अनुपात में असंतोष भी।
जो लोग कभी घुटने मोड़ना नहीं सीख पाए, उन्हें ज़रा-सी असुविधा भी चुभने लगती है। वे जीवन से लड़ते हैं, जबकि जीवन तो उनके सामने केवल छोटा-सा समझौता ही चाहता है।
अक्सर, समाज में समझौते बनाम धीरज और झुकने को कमजोरी समझा जाता है, किन्तु सच्चाई इसके उलट है। घुटने मोड़कर सोने वाला व्यक्ति हार नहीं मानता, वह हालात को पढ़ता है, समझता है, फिर आगे की रणनीति बनाता है। वह जानता है कि हर लड़ाई जीतनी ज़रूरी नहीं, कुछ लड़ाइयों को टालना भी बुद्धिमानी है।
यह समझौता आत्मसम्मान का त्याग नहीं, बल्कि आत्मसंरक्षण है। यही कारण है, कि ऐसे लोग कम में भी संतोष खोज लेते हैं और ज़्यादा में भी संयम बनाए रखते हैं।
समझौते का मतलब सब कुछ छोड़ना नहीं और पराजित होना नहीं है, क्योंकि इसका संघर्ष मनुष्य को तोड़ता नहीं, उसे तराशता है। जिसने कभी छोटी चादर में रात गुजारी है, वही जानता है कि सुकून क्या होता है। जिसने अभाव देखा है, वही कृतज्ञता का मूल्य समझता है।
ऐसे लोग जब आगे बढ़ते हैं, तो घमंड नहीं पालते, क्योंकि उन्हें पता होता है कि ज़मीन कितनी ठंडी हो सकती है और छत कितनी दूर।
जीवन का एक पक्ष यह भी है कि हर व्यक्ति यह कला नहीं सीख पाता। कुछ लोग हालात बदलने के इंतज़ार में पूरी ज़िंदगी गुज़ार देते हैं, लेकिन खुद को बदलने का साहस नहीं जुटा पाते। वे चादर को कोसते रहते हैं, पर घुटने मोड़ने यानी थोड़ा रुककर लड़ने को अपमान समझते हैं। और यहीं से दु:ख जन्म लेता है-क्योंकि जीवन इंतज़ार नहीं करता।
जीवन के उतार-चढ़ावों के मायाजाल में इस बात को गले उतारने की आवश्यकता है कि सच्चा ऐश्वर्य लम्बी चादर नहीं, बल्कि वह क्षमता है; जिससे हम खुद को समेट सकें। जिसने घुटने मोड़कर सोना सीख लिया, उसने जीवन का सबसे कठिन पाठ सीख लिया। ऐसे लोग न हालात से डरते हैं, न भविष्य से, क्योंकि उन्हें भरोसा होता है-चादर चाहे जितनी भी छोटी हो, अगर जीना आ गया, तो ज़िन्दगी कभी अधूरी नहीं लगती।