डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-१९…
भगवान ने हथेली के आगे अंगुलियाँ इसलिए बनाई है कि पहले आप कर्म करें, फिर भाग्य को महत्व दें। बिना कर्म के आपका अच्छा भाग्य नहीं बन सकता है। इंसान कितना भी गोरा क्यों न हो, परन्तु उसकी परछाई काली ही होती है। ‘मरने के बाद अर्थी को ४ लोग कंधा देते हैं, अर्थात सहारा देते हैं। अगर इन चारों में से किसी एक ने जिन्दा रहते हुए उस व्यक्ति को सहारा दिया होता तो शायद मरने की नौबत नहीं आती।’
एक बात गाँठ बांधकर रखिए- ज़िंदगी की दौड़ में जो आपको दौड़ कर नहीं हरा सकते, वे आपको तोड़ कर हराने की कोशिश जरूर करते हैं।
उम्र के इस दौर में मैं क्या ‘वैलेन्टाईन डे’ मनाऊँगा, क्योंकि अब ‘टेडी बियर’ भी ‘ठंडी बियर’ सुनाई देता है। ज़िंदगी का यह कड़वा सत्य है कि हम पहला स्नान भी स्वयं नहीं कर पाते हैं और अंतिम स्नान भी हमें दूसरे लोग ही कराते हैं। ज़िंदगी में तूफान का आना जरूरी है, तभी तो पता चलता है, कि कौन हमारा हाथ पकड़ता है और कौन साथ छोड़ता है। बड़े नोट और बड़े लोग कभी भी बदल सकते हैं, इसलिए छोटे नोट और छोटे लोगों से रिश्ता मजबूत रखें, ताकि बाद में पछताना ना पड़े।
‘जिस गलती से हम कुछ सीख नहीं पाते, वो जीवन की सबसे बड़ी गलती है।’ दामाद को सीधा ‘बैल’ नहीं बोल सकते हैं, इसलिए ससुराल वाले अपनी बेटी को ही ‘गाय’ बोल देते हैं।
‘एक मुर्गी ने बतख से शादी कर ली तो मुर्गे ने उससे पूछा, “क्या हम मर गए थे, जो तुमने बतख से शादी की ?”
मुर्गी ने जवाब दिया, “मैं तो तुम्हीं से शादी करना चाहती थी, मगर मेरे पापा चाहते थे कि लड़का नेवी में हो।”
कसम की जगह यदि गवाह को शराब के २-४ पैग पिलाए जाएं तो सच के बाहर आने की ज्यादा संभावना रहती है। जब पहली बार इंसान ने मछली का शिकार किया, तो मछली ने उसे श्राप दिया कि, हमेशा तुम नेट में ही रहोगे। देखिए, अब मछली का श्राप सच हो गया है। दवा की पर्ची में लिखा इंजेक्शन मरीज नहीं लाया तो चिकित्सक ने कारण पूछा, तो मरीज ने बताया कि शनिवार को सुई नहीं खरीदते हैं, वरना शनिदेव नाराज हो जाते हैं। तभी डॉक्टर ने कहा, “ले आओ, वरना यमराज नाराज हो जाएंगे।”
पहले राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनी, फिर एक चाय वाला प्रधानमंत्री बना, फिर पनीर सेल्वम मुख्यमंत्री बने। माँ सच कहती थी, कि दूध में बहुत ताकत होती है।
जिनके साथ बात करने से ही खुशी दोगुनी हो और दुःख आधा हो जाए, वो ही अपना है; बाकी तो सब दुनिया है।
‘मैंने वन विभाग में पूछा, “मेरे घर में भी एक शेरनी है, उस पर आप कार्यवाही कर सकते हैं क्या ?” उन्होंने उत्तर दिया, “आपने उसको घर में लाने से पहले वन विभाग से परमिशन ली थी क्या ?”
रिश्ता चाहे कोई भी हो, हीरे की तरह होना चाहिए। दिखने में छोटा हो, परन्तु अनमोल। सब कुछ सीखना ही ज्ञान नहीं है, बहुत कुछ नजर अंदाज करना भी ज्ञान है। ‘मोबाईल में बैलेंस डलवाते-डलवाते अब आँखों में २ लैंस उतरवाने की बारी आ गयी है ?’
चुनाव के बाद नेता बदल जाते हैं और शादी के बाद बीवी कैसे बदल जाती है, देखिए- पहले साल-मैंने कहा जी खाना खा लीजिए, आपने बहुत देर से कुछ नहीं खाया है। दूसरे साल-खाना तैयार है, लगा दूँ ? तीसरे साल-खाना बन चुका है, जब खाना हो, तब बता देना। चौथे साल- मैं बाजार जा रही हूँ। खाना बना कर रख दिया है, खुद ही निकालकर खा लेना। पाँचवे साल-सुनते हो, आज मुझसे खाना नहीं बनेगा- होटल से ले आओ। छठे साल- जब देखो खाना और खाना, अभी थोड़ी देर पहले तो खाया था, और कोई काम नहीं है क्या!
‘इंटरव्यू में प्रश्न पूछा गया,- बताइए, वो कौन-सी औरत है, जिसको १०० प्रतिशत पता होता है कि उसका पति कहाँ है ? लड़के ने शानदार उत्तर दिया,- विधवा औरत।’
जीने के लिए केवल आज ही है,
आने वाला कल तो एक सपना है।
परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |