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तुम क्या कर सकते हो ?

डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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“अच्छा एक बात बताओ, तुम प्रेम की दीवानगी में मेरे लिए क्या कर सकते हो ?”
“शायरी की भाषा में कहूं तो… आसमान का चाँद और सितारे तोड़कर तुम्हारी जींस और अपर में टाँक सकता हूँ!”
“वाह… वाह! क्या बात है! अच्छा इसके अलावा…?”
“इसके अलावा… तुम इस सारे ब्रह्मांड में मुझे सबसे सुंदर लगती हो, इसलिए मैं… मैं… तुम्हारे लिए सौन्दर्य के सैकड़ों गीत लिख सकता हूँ!”
“वाह… बहुत खूब! खुद को दीवाना कहते हो, तो बताओ तुम मेरे लिए और क्या कर सकते हो…?”
“मैं… मैं… तुम्हारे लिए पलकों से चादर बुन सकता हूँ… क्योंकि तुम ही तो मेरी अंधेरी जिंदगी का उज़ाला हो! मुझे लग रहा है कि इस आशिकाना मौसम के कारण तुम आज़ कुछ ज्यादा ही ‘रोमांटिक’ हो गई हो!”
“सच कहा तुमने… लो मैं तुमसे लिपट गई…! एक सवाल और… देखती हूँ प्रेम के इस इम्तिहान में तुम पास होते हो या फेल…!”
“आज तो तुम मेरा पूरा ‘इंटरव्यू’ ही ले रही हो…! पूछो…!”
“आखरी सवाल…. अभी जो तुमने कहा, इन सबके अलावा तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो ?”
“हा… हा… हा… हा…, तो सुनो मैं तुम्हें दुनिया की हर खुशी दूंगा… तुमसे शादी करके तुम्हें फूल से सुंदर बच्चे दूंगा!”

यह सुनकर वह उसे झटकती हुई बोली- “सुनो! मुझे जीवन का लुत्फ़ लेना है और तुम मुझे बांधना चाहते हो…? ‘लिव इन’ में रह रहे, यही बहुत है… ‘नॉनसेंस’…! सारा ‘मूड’ चौपट करके रख दिया।”