कुल पृष्ठ दर्शन : 1

तुम मात्र अनुगामिनी

डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
************************************************

कह तो दिया जाता है मुझसे,
अक्सर…
सब कुछ तुम्हारा ही तो है,
घर-द्वार, खेत-खलिहान
बाग-बगीचे, जमीन-जायदाद,
पर…
अंकित कहीं नहीं होता है,
किसी भी दस्तावेज़ पर
मेरा हकीकी नाम…
नहीं रख सकती मैं अपनी मर्जी से,
बाग-बगीचे और खेतों की मेड़ों पर
खनकती पायलों से स्वछंद कदम…
नहीं मांग सकती मैं अपनी मर्जी से,
चंद रुपए-पैसे और खर्च के हिसाब
रसोई के किसी कोने में…
रह जाता है कुंठित मन और सुबकता
एहसास…
तुम हो घर की लक्ष्मी, स्वामिनी, अर्धांगिनी,
पर… दरवाजे की कुंडी पर
हाथ रखते ही ध्वनित हो जाता है,
भीतर का मौन संवाद…
तुम अनुगामिनी हो… तुम,
मात्र अनुगामिनी…।

कह तो दिया जाता है मुझसे,
अक्सर…
तुम बहू नहीं, बेटी हो, घर की नींव हो,
संसार हो, घर की खुशियाँ हो,
पर…
हर वक्त साबित करना पड़ता है,
मैं सिर्फ बहू हूँ… बहू हूँ…
मेरी चंचल शोख हँसी से होती है,
दिक्कतें, रुकावटें, मुश्किलें…
मेरे रूठने से टूट जाती है,
स्नेहिल बंधन की सारी डोर
मेरी आजादी से बिखर जाते हैं,
घर के सारे रस्म-रीति और रिवाज़
मेरे हृदय में मचा अनकहा शोर,
क्यों नहीं सुन पाते हैं सब,
क्यों नहीं देख पाते है, घर की दीवारों-सा,
चिटकती मेरी देह में पड़ी दरारें,
क्यों नहीं भर पाते हैं वो…।
अपनी मधुरिमा से,
मेरे मन की गिरहों का खालीपन…॥