कल्याण सिंह राजपूत ‘केसर’
देवास (मध्यप्रदेश)
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यूँ ही कोई कुंदन नहीं बन जाता है, धधकती आग में गलना होता है
देवताओं के सिर पर बैठना, कहाँ हर फूल का नसीब होता है।
गले का हार बनने के लिए भी हर, फूल को जिगर में घुसी सुई का दर्द सहना होता है
सभी शिखर पर बैठे को देखते हैं, किंतु पहुंचने का दर्द कोई नहीं जानता है।
जिसके सीने में लगे शूल उसका दर्द वही जानता है,
मत पूछ कितने छाले हैं, कदमों में मेरे, तुझे पाने में सनम तू कहाँ जानता है।
नहीं दिखाते हैं लोग अब अपने ज़ख्म भी,
क्योंकि अब तो अपने ही मिर्च डाल जाते हैं ‘केसर॥’