पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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२७ फरवरी को दिल्ली की एक विशेष अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने भारतीय राजनीति की दुनिया को हिलाकर रख दिया। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को दिल्ली शराब नीति घोटाले में बरी कर दिया गया। यह वह मामला था जिसने पिछले लगभग ३ वर्षों में भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया था
दिल्ली शराब नीति २०२१-२२ को आम आदमी पार्टी सरकार ने लागू किया था। इसका उद्देश्य शराब के खुदरा व्यापार का निजीकरण करके राजस्व बढ़ाना था, लेकिन कथित अनियमितताओं के आरोप लगे और नीति को वापस ले लिया गया। सीबीआई और ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने इस मामले में सक्रिय जाँच की। कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। मनीष सिसोदिया को डेढ़ वर्ष से अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा, जब उनकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार थीं। अरविंद केजरीवाल भी कुछ समय के लिए जेल गए और दिल्ली विधानसभा चुनाव २०२५ से पहले जमानत पर रिहा हुए।
अदालत का यह फैसला कई गहरे सवाल उठाता है। क्या यह केवल एक कानूनी निर्णय है, या यह भारतीय लोकतंत्र और न्याय प्रणाली के बारे में कुछ महत्वपूर्ण कह रहा है ? अगर अदालत ने इन्हें बरी कर दिया, तो क्या जाँच एजेंसियाँ-जिन्होंने इतने धूमधाम से इस मामले को चलाया, गलत थीं ? या मामला वाकई था, लेकिन साक्ष्य पर्याप्त नहीं जुटाए जा सके ? ये सवाल आसान नहीं हैं, और इनके उत्तर बहुआयामी हैं।
आआप और विपक्षी दलों का शुरू से कहना था, कि यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है। उनका तर्क था कि केंद्र सरकार सीबीआई और ईडी को अपने राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए इस्तेमाल कर रही है। ‘इण्डिआ’ गठबंधन के नेताओं ने बार-बार ‘वॉशिंग मशीन’ का रूपक इस्तेमाल किया, यानी जो बीजेपी में जाता है वह ‘साफ’ हो जाता है। दूसरी तरफ, भाजपा का कहना था, कि यह एक वास्तविक भ्रष्टाचार का मामला है और जाँच निष्पक्ष थी। उनके अनुसार, जाँच एजेंसियाँ स्वतंत्र रूप से काम कर रही थीं।
अब जब अदालत ने बरी कर दिया है, तो सवाल उठता है कि अगर कोई अपराध नहीं हुआ था तो इन नेताओं को इतने लंबे समय तक जेल में क्यों रखा गया ? एक आरोपी व्यक्ति को इतनी तकलीफ देना, जिसे बाद में अदालत ने निर्दोष पाया, क्या यह न्यायसंगत है ? भारतीय न्यायशास्त्र में एक मूलभूत सिद्धांत है- ‘जब तक दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष माना जाए।’ क्या इस सिद्धांत का वास्तव में पालन होता है ?
यह मामला भारत की जाँच और न्यायिक प्रक्रिया की कमज़ोरियाँ उजागर करता है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार, भारत की जेलों में ७० प्रतिशत से अधिक कैदी विचाराधीन हैं, यानी जिनपर अभी दोष सिद्ध नहीं हुआ। ये लोग केवल इसलिए जेल में हैं, क्योंकि उन्हें जमानत नहीं मिली। जमानत प्रावधानों को और उदार बनाने की ज़रूरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी कई बार इस पर चिंता व्यक्त की है।
अब ईडी के अधिकारों पर भी बहस जारी है। ईडी की शक्तियाँ, जिनमें संपत्ति जब्त करना और गिरफ्तारी शामिल हैं- बेहद व्यापक हैं। पीएमएलए (प्रिवेन्शन ऑफ मनी लांडरिंग एक्ट) के तहत जमानत पाना अत्यंत कठिन है। सर्वोच्च न्यायालय ने २०२३ में एक फैसले में कहा था कि पीएमएलए प्रावधान ‘कठोर’ हैं, लेकिन संवैधानिक हैं। फिर भी, इन कानूनों के दुरुपयोग की संभावना हमेशा बनी रहती है। सीबीआई और ईडी की स्वायत्तता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक स्वतंत्र निगरानी तंत्र की ज़रूरत है।
इस फैसले के राजनीतिक निहितार्थ भी महत्वपूर्ण हैं। आगामी पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में इसका असर पड़ेगा। आआप, जो २०२५ के दिल्ली चुनाव में हार गई थी-अब इस बरी होने को ‘नैतिक विजय’ के रूप में प्रस्तुत करेगी। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिआ’ को नई ऊर्जा मिलेगी। दूसरी तरफ, भाजपा के सामने सवाल खड़े होंगे कि इतने बड़े मामले में आखिरकार आरोपी बरी क्यों हो गए।
यह फैसला एक महत्वपूर्ण याद दिलाता है-भारत की न्यायपालिका अभी भी स्वतंत्र और सक्षम है। चाहे जितना राजनीतिक दबाव हो, न्यायाधीश साक्ष्य के आधार पर फैसला देते हैं। यह लोकतंत्र की असली ताकत है।