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दोनों सरहदें

सीमा जैन ‘निसर्ग’
खड़गपुर (प.बंगाल)
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सरहदों पर चौकन्ने खड़े जवान, बाहरी दुश्मनों से जूझ रहे हैं
भीतर उधम मचाते शैतान, नमक-हरामी करने पर तुले हुए हैं।

किसकी जान बचाने खातिर, निशंकित सैनिक सीमा पर डटे हैं ?
घरेलू उपद्रवी तो सैनिकों की पीठ में,
छुरा भोंकने मचल रहे हैं।

कैसी विडम्बना देशभक्तों के दिल में, रह-रहकर समाई है
परायों से ज्यादा अपनों के, विश्वासघात की कसक मन पर छाई है।

जो शहर-शहर जनता का जीना, मुहाल कर दबंगई मचा रहे हैं
क्या थोड़ी भी शर्म उनकी बेग़ैरत, ईमान में नहीं बच पाई है ?

काश! ये आंतरिक बागबान बन, जनता के सच्चे रखवाले हो जाते।
देश की दोनों सरहदें सुरक्षित रख, सैनिक निश्चिंत अपना फ़र्ज़ निभाते॥