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नाट्य-साहित्य के पुरोधा थे डॉ. चतुर्भुज, गीत-निर्झर थे विशुद्धानंद

पटना (बिहार)।

रेल में अधिकारी और आकाशवाणी में निदेशक रहे बिहार के महान रंगकर्मी डॉ. चतुर्भुज नाट्य-साहित्य के प्रणम्य पुरोधा थे। नाट्य-साहित्य को मंचन योग्य शिल्प देकर उन्होंने न केवल रंगमंच को समृद्ध किया, अपितु अपनी मोहक काव्य-कल्पनाओं से ऐतिहासिक नाटकों को विपुल समृद्धि प्रदान की। अपने नाटकों से उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि वे एक लेखक ही नहीं, एक महान दार्शनिक चिंतक भी हैं। दूसरी ओर कवि विशुद्धानन्द एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने अपने मर्म-स्पर्शी गीतों से हिन्दी के काव्य-साहित्य को नूतन ऊर्जा दी। उनका जीवन-दर्शन प्रेरणादायक है।
यह बातें बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हुए जयंती-सह-सम्मान समारोह एवं कवि सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने कही। डॉ. चतुर्भुज के पुत्र एवं सुप्रसिद्ध नाटककार डॉ. अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि डॉ. चतुर्भुज मेरे आचार्य भी थे। जो कुछ भी सीखा, उन्हीं से सीखा। उन्होंने ही मुझे गढ़ा और नाटककार बनाया।
इस अवसर पर वरिष्ठ कवि डॉ. विजय शंकर मिश्र को ‘कवि विशुद्धानंद स्मृति सम्मान’ से अलंकृत किया गया। विशुद्धानंद जी द्वारा स्थापित सांस्कृतिक संस्था ‘आनन्दा श्रम’ के सौजन्य से डॉ० मिश्र को ५१०० ₹ की सम्मान राशि के साथ वंदन-वस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। उपाध्यक्ष डॉ. मधु वर्मा, साहित्य मंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी, डॉ. संजय पंकज, डॉ. किशोर सिन्हा ने भी उद्‌गार व्यक्त किए।
इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र की वाणी-वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि बच्चा ठाकुर, श्याम बिहारी प्रभाकर, सिद्धेश्वर व इन्दु भूषण सहाय आदि ने दोनों साहित्यिक विभूतियों को काव्यांजलि अर्पित की।

मंच का संचालन कुमार अनुपम ने किया। धन्यवाद पुस्तकालय मंत्री अशोक कुमार ने माना।