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पेड़ बनो

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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बन सको तो पेड़ बनो,
सीखो इनसे देना
परहित में जिसने सदा,
सीखा सब कुछ अपना देना।

अपनी शाखों में पंछियों को,
देते स्नेह बसेरा
इनकी शीतल छाँव तले,
कितनों ने डाला डेरा।

जब तक रहता अस्तित्व इनका,
प्राण-वायु ये देते
तपती धूप में राहगीरों को,
शीतल छाया देते।

क्षमा भावना इनसे सीखो,
पत्थर खाकर भी फल देते
मीठे फल से भूख मिटाते,
शीतल पवन सुख देते।

जड़ें पकड़ें धरती को ऐसे,
बाढ़ को आने से रोकें।
वर्षा को भी आमंत्रित कर,
हरियाली से धरा संजोएँ।

हर अंग अर्पित परहित में,
तना, पत्ते, फूल और फल
कुल्हाड़ी के वार सहें फिर भी,
फिर भी देते हैं मीठे फल।

महिमा इनकी कही न जाए,
कितने इनके गुण गाएँ।
अपने इन पावन गुणों से,
भारत में पूजे जाएँ॥