कुल पृष्ठ दर्शन :

बहुआयामी व्यक्तित्व थे जयशंकर प्रसाद

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

*************************************************

हिंदी साहित्य के आकाश में जिन नक्षत्रों की ज्योति युगों तक आलोकित रहेगी, उनमें महाकवि जयशंकर प्रसाद का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे छायावाद के शिखर स्तम्भ, रहस्यवाद के गम्भीर चिन्तक, स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिधर्मी उदघोषक तथा आधुनिक हिंदी नाटक के अप्रतिम शिल्पी थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था और कर्तृत्व अत्यन्त व्यापक, जिसने हिंदी साहित्य को नई संवेदना, नई दृष्टि और नवीन सौन्दर्यबोध प्रदान किया।
बाल्यकाल से ही संस्कृत, फारसी, उर्दू और हिंदी का गहन अध्ययन उनके संस्कारों में रचा-बसा। पारिवारिक वैभव, व्यापारिक उत्तरदायित्व और आत्मसंघर्षों के बीच उन्होंने साहित्य साधना को जीवन का परम लक्ष्य बनाया। उनकी रचनाओं में भारतीय सांस्कृतिक चेतना, दार्शनिक गम्भीरता, करुणा, प्रेम, सौन्दर्य और राष्ट्रप्रेम का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। छायावाद को उन्होंने केवल काव्यधारा नहीं, बल्कि आत्मानुभूति का सजीव दर्शन बनाया। उनकी कविता में प्रकृति, प्रेम और आत्मचिन्तन एक-दूसरे में विलीन होकर मानवीय संवेदना को व्यापक बनाते हैं। ‘आँसू’, ‘झरना’, ‘लहर’ और ‘कामायनी’ उनके काव्य-संसार के अमूल्य रत्न हैं। विशेषत: ‘कामायनी’ हिंदी महाकाव्य परम्परा की अद्वितीय कृति है, जिसमें श्रद्धा, इड़ा और मनु के माध्यम से मानव-मन की दार्शनिक यात्रा, कर्म, ज्ञान और भाव का समन्वय अत्यन्त सशक्त रूप में व्यक्त हुआ है।
प्रसाद केवल कवि ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के नाटककार भी थे। ‘स्कन्दगुप्त’, ‘चन्द्रगुप्त’, ‘ध्रुव स्वामिनी’ व ‘अजातशत्रु’ जैसे ऐतिहासिक नाटकों में उन्होंने राष्ट्रीय चेतना, वीरता, कर्तव्य और त्याग के आदर्श प्रतिष्ठित किए। उनके नाटकों की भाषा संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी ओजस्वी, भावपूर्ण और मंच-सजीव है। पात्रों के संवादों में आत्मसम्मान, राष्ट्रप्रेम और मानवीय गरिमा की गूँज स्पष्ट सुनाई देती है।
रहस्यवाद के क्षेत्र में प्रसाद की साधना आत्मा और परमात्मा के सूक्ष्म सम्बन्धों को उजागर करती है। उनकी कविता में आत्मा का अनन्त आकाश, मौन का संगीत और करुणा की उजली ज्योति पाठक को भीतर तक आलोकित कर देती है। वे मानव को संकीर्णता से निकालकर विराट चेतना से जोड़ते हैं।
इस प्रकार जयशंकर प्रसाद का व्यक्तित्व संवेदनशील कवि, दार्शनिक चिन्तक, राष्ट्रप्रेमी युगद्रष्टा और समर्थ नाटककार के रूप में प्रतिष्ठित है। उनका कर्तृत्व हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है, जो पीढ़ियों को प्रेरणा, सौन्दर्य और आत्मबोध की दिशा देता रहेगा।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥