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बहुआयामी हैं कामकाजी महिलाओं की समस्याएं

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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भारतीय समाज में जब कोई महिला यह निर्णय करती है, कि वह घर की चहारदीवारी से बाहर निकल कर कार्यस्थल पर अपनी प्रतिभा और परिश्रम से जीवन का निर्माण करेगी, तो यह निर्णय केवल आजीविका का नहीं, एक समग्र जीवन-दर्शन का, एक साहसिक चुनाव का प्रतीक होता है। वह महिला जानती है कि उसके सामने २ मोर्चे एकसाथ खुलेंगे- एक घर के भीतर और एक घर के बाहर, परंतु जो वह पूर्णतः नहीं जानती, वह यह है कि ये दोनों मिलकर इतने जटिल, इतने बहुस्तरीय और इतने थकाने वाले हैं कि उनका पूरा बोझ समझने के लिए भी शायद आजीवन का अनुभव चाहिए। कामकाजी महिलाओं की समस्याएं एकायामी नहीं, बहुआयामी हैं- वे आर्थिक हैं, सामाजिक हैं, मनोवैज्ञानिक हैं, शारीरिक हैं, संस्थागत हैं और सांस्कृतिक भी। इन समस्याओं की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हर बार जब हम सोचते हैं कि अब तो परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं, तब एक नया आँकड़ा, एक नई घटना, एक नया अध्ययन सामने आकर हमें याद दिला देता है कि परिवर्तन की गति अभी पर्याप्त नहीं है।
भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर (एलएफ पीआर) के आँकड़े सतह पर देखने में उत्साहजनक लगते हैं, पर पीएलएफएस २०२३-२४ के अनुसार यह दर ४१.७ प्रतिशत तक पहुँच गई है, जो २०१७-१८ के २३.३ प्रतिशत से लगभग दोगुनी है। इस संख्या के नीचे जाकर देखें तो एक बिल्कुल भिन्न चित्र उभरता है। इस बढ़ोत्तरी का बड़ा भाग अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र में है- खेतों में, मिट्टी के बर्तन बनाने वाली कार्यशालाओं में, हथकरघा उद्योगों में, निर्माण स्थलों पर और घरेलू सेवाओं में। पुरुषों और महिलाओं के बीच वेतन में लगभग २५.४ प्रतिशत का अंतर है, और असंगठित क्षेत्र में महिला श्रमिकों को बहुत कम वेतन पर काम करना पड़ता है, जहाँ काम की लंबी अवधि, अस्वीकार्य कार्य परिस्थितियाँ और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं निरंतर बनी रहती हैं। चीन में महिला श्रम भागीदारी दर ६० प्रतिशत है, रूस में ५५ और दक्षिण अफ्रीका में ५० प्रतिशत- इनके समक्ष भारत का आँकड़ा यह भी बताता है कि हमें अभी कितना लंबा रास्ता तय करना है।
कामकाजी महिलाओं की समस्याओं में सबसे अधिक चर्चित है और सबसे कम सुलझा हुआ भी मुद्दा यह है कि भारत में समान पदों पर कार्यरत महिलाएं प्रति १००₹ की तुलना में औसतन केवल ८५ ₹ कमाती हैं। यह वेतन-अंतर केवल प्रवेश स्तर पर नहीं है;बल्कि जैसे-जैसे महिला पदोन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ती हैं, यह और बढ़ता जाता है। प्रबंधकीय स्तर पर यह अंतर ३.१ प्रतिशत और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर ४.९ से ६.१ प्रतिशत तक पहुँच जाता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का एक आकलन तो यहाँ तक कहता है कि वर्तमान गति से भारत में लैंगिक वेतन समानता प्राप्त करने में २२३ वर्ष लग सकते हैं। वैश्विक स्तर पर वेतन के संबंध में महिलाओं को पुरुषों को दिए जाने वाले प्रत्येक १ डॉलर पर केवल ७७ सेंट का पारिश्रमिक प्राप्त होता है। इस असमानता के पीछे तर्क दिए जाते हैं कि महिलाएं कम घंटे काम करती हैं, या उनके करियर में अवरोध आते हैं- लेकिन यह तर्क उन अवरोधों की उपेक्षा करता है जो व्यवस्था स्वयं निर्मित करती है। मातृत्व अवकाश के बाद कार्यस्थल पर वापसी, बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी और परिवार की अपेक्षाएं- ये वे कारण हैं, जो महिला करियर को बाधित करते हैं, और फिर इसी बाधा को महिला की ‘कम प्रतिबद्धता’ बताकर कम वेतन का औचित्य सिद्ध किया जाता है।
‘ग्लास सीलिंग’- कामकाजी महिलाओं की उस पीड़ा का नाम है जो दिखती नहीं, किंतु महसूस होती है। भर्ती एजेंसी ‘टीमलीज सर्विसेज’ के एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में दस में से पाँच महिला कर्मचारियों ने किसी न किसी रूप में लैंगिक भेदभाव का अनुभव किया है- यह भेदभाव वेतन, कार्य के घंटे, अवकाश, अवसर और पदोन्नति के मामले में है। एक ही योग्यता और अनुभव के बावजूद पुरुष उम्मीदवारों को वरीयता देने की अनकही परंपरा अनेक संस्थानों में आज भी है। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों वाली महिलाओं को भर्ती प्रक्रिया के दौरान और पदोन्नति की संभावनाओं के लिए प्रतिस्पर्धा करते समय नुकसान उठाना पड़ता है। यह भेदभाव कानूनी दृष्टि से अवैध है, किंतु इसे साबित करना लगभग असंभव है, क्योंकि यह कभी लिखित नहीं होता। यह निर्णायक मेज के इर्द-गिर्द फुसफुसाहटों में, ‘वह तो माँ बनेगी इसलिए देर-सबेर छोड़ देगी’ जैसी मान्यताओं में, और टीम की बैठकों में महिला आवाज को काटकर बोलने की आदत में बसता है।
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की समस्या कामकाजी महिला के जीवन का एक ऐसा आयाम है, जिसके बारे में बोलने में आज भी समाज असहज रहता है। २०१३ में लागू हुए पॉश अधिनियम (कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिला संरक्षण अधिनियम) को एक दशक से अधिक समय बीत चुका है, किंतु इसका कार्यान्वयन अभी भी अत्यंत असंतोषजनक है। २०२२-२३ में भारत की शीर्ष ३०० सूचीबद्ध कंपनियों में से ११६० शिकायतें केवल ८१ कंपनियों में दर्ज हुईं- अर्थात २१९ कंपनियों ने शून्य शिकायत बताई। यह शून्य आँकड़ा यह नहीं बताता कि उन २१९ में उत्पीड़न नहीं होता, बल्कि यह बताता है कि वहाँ महिलाएं शिकायत करने में असमर्थ या असुरक्षित महसूस करती हैं। २०२३ में सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को लागू हुए एक दशक बीत जाने के बाद भी इसके प्रवर्तन में गंभीर कमियों पर खेद व्यक्त किया।
आवागमन की असुरक्षा, जो प्रायः चर्चाओं में उपेक्षित रह जाती है- कामकाजी महिला के जीवन की यह एक कठोर वास्तविकता है। कार्यालय पहुँचने से पहले और घर लौटने के बाद की यात्रा भी उसके लिए एक संघर्ष है। भारत में सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाली ८४ प्रतिशत महिलाएं हैं, और यात्रा के दौरान वे मौखिक और शारीरिक उत्पीड़न की शिकार होती हैं, किंतु बहुत कम इसकी रिपोर्ट करती हैं। २०२१ में महानगरीय क्षेत्रों में किए गए एक सर्वेक्षण में लगभग ५६ प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उन्हें सार्वजनिक परिवहन में यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। इस भय और असुरक्षा का परिणाम यह होता है कि अनेक परिवार रात्रि पाली में काम करने से या दूर के कार्यस्थलों पर जाने से महिला को रोकते हैं- और कभी-कभी महिला स्वयं ऐसे अवसरों को छोड़ देती है, जो उसके करियर को ऊंचाई दे सकते थे।
‘दोहरा बोझ’- यह शब्द सुनने में सरल लगता है, किंतु इसमें कामकाजी महिला का पूरा जीवन समाहित है। कार्यालय में आठ-दस घंटे काम करके घर लौटती महिला से अपेक्षा की जाती है कि वह खाना पकाए, बच्चों की देखभाल करे, बुजुर्गों की सेवा करे और पति की भावनात्मक जरूरतें पूरी करे- इस सबके बावजूद यह मान लिया जाता है कि वह अगली सुबह ताजी और ऊर्जावान होकर फिर काम पर जाएगी। महिलाएं पुरुषों की तुलना में प्रतिदिन औसतन २.४ घंटे अधिक अवैतनिक देखभाल कार्य में व्यतीत करती हैं, जिसमें से अधिकांश बच्चों की देखभाल पर खर्च होता है। यह वह श्रम है जो जीडीपी में नहीं दिखता, राष्ट्रीय आय में नहीं जुड़ता, और सेवानिवृत्ति पर कोई पेंशन नहीं देता – फिर भी यह समाज की नींव है। इसीलिए अर्थशास्त्री इसे ‘अदृश्य अर्थव्यवस्था’ कहते हैं। और इसकी सबसे बड़ी श्रमिक है- कामकाजी महिला, जो घर और दफ्तर दोनों को एकसाथ सँभाल रही है।
ग्रामीण और असंगठित क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं की समस्याएं तो और भी अधिक कठोर हैं। आशा कार्यकर्ता – जो दस लाख से अधिक महिला सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का एक संवर्ग है — पूर्णकालिक कार्य के लिए प्रति माह औसतन केवल ४०००-५०००₹ का अनियमित मानदेय पाती हैं और उन्हें पूर्णकालिक औपचारिक कर्मचारी के रूप में मान्यता भी नहीं दी गई है। ये वे महिलाएं हैं जो जन-स्वास्थ्य की रीढ़ हैं, किंतु स्वयं सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। खेतिहर महिला मज़दूर कृषि श्रम में पुरुषों से अधिक घंटे काम करती हैं – बुआई से लेकर कटाई तक- किंतु उन्हें प्रायः समान दैनिक मज़दूरी नहीं मिलती, और भूमि उनके नाम नहीं होती। महिलाएं जब संगठनात्मक श्रेणी में ऊपर चढ़ती हैं, तो लैंगिक वेतन अंतर बढ़ता जाता है- यही कारण है कि भारत में महिला कर्मचारी करियर के हर चरण पर पुरुषों की तुलना में कम कमाती हैं।
कार्यस्थल पर महिला के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव,
विश्व के ६२ देशों में पुरुषों और महिलाओं की सेवानिवृत्ति आयु एक समान नहीं आदि इन सब समस्याओं का एक सामूहिक परिणाम यह होता है कि समाज उस विशाल मानवीय पूँजी से वंचित रह जाता है, जो कामकाजी महिलाओं के रूप में उपलब्ध है। यदि भारत में महिला श्रम बल भागीदारी को पर्याप्त रूप से बढ़ाया जाए, तो जीडीपी वृद्धि दर में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान के अनुसार यदि भारत में महिला श्रम भागीदारी पुरुषों के समान हो जाए, तो जीडीपी २७ प्रतिशत तक बढ़ सकती है। यह केवल महिला अधिकार का नहीं, राष्ट्रीय समृद्धि का प्रश्न है।
सार यह है कि कामकाजी महिलाओं की समस्याएं न तो एकल हैं, न अलग-थलग-वे परस्पर जुड़ी हुई हैं, एक-दूसरे को पोषित करती हैं और मिलकर एक ऐसी जटिल व्यवस्था बनाती हैं जिसे तोड़ने के लिए बहु-स्तरीय प्रयास आवश्यक हैं। कानूनों का कठोर क्रियान्वयन, संस्थागत जवाबदेही, सामाजिक सोच में परिवर्तन, परिवारों के भीतर घरेलू जिम्मेदारियों का न्यायसंगत वितरण, और कार्यस्थल संस्कृति में मूलभूत बदलाव- ये सब एकसाथ होने चाहिए। जब तक कामकाजी महिला को घर में ‘अतिरिक्त कमाऊ सदस्य’ की बजाय समान भागीदार का दर्जा नहीं मिलेगा, जब तक कार्यस्थल पर उसे पुरुष की ‘कृपा’ नहीं, बल्कि अपने अधिकार के रूप में अवसर नहीं मिलेंगे, और जब तक सड़क पर, बस में, कार्यालय के गलियारे में उसकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी-तब तक ‘महिला सशक्तिकरण’ एक नारा मात्र रहेगा, नीति नहीं। कामकाजी महिला के प्रश्न को जब तक हम एक राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक यह समस्या- जो बहुआयामी है, बहुस्तरीय है, और जिसकी जड़ें समाज के हर कोने में हैं- वैसे ही बनी रहेगी।