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बाजार में ईमान बेच रहा

कल्याण सिंह राजपूत ‘केसर’
देवास (मध्यप्रदेश)
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पहले दिल की ज़ुबां को,
बिन कहे नजरों से ही
समझ जाते थे
प्रेम में ऐसी मौन प्रगाढ़ता होती थी।

हर स्पर्श निष्कपट था,
हर साँस में पवित्रता का,
एहसास होता था
मन से मन का जुड़ना,
ऐसा रिश्ता होता था।

कहाँ गए वो दिन,
जब दिल ही मंदिर होता था ?
जहाँ प्रेम की पूजा होती थी,
और ईमान धर्म ही लक्ष्य होता था।

अब तलाश है उसकी जो,
तन-मन-धन
और भोग-विलास दे रहा हो
खानदान, पारिवारिक रिश्ते,
लोकलाज सब नगण्य होते
जब ऐशो-आराम मिल रहा हो।

अब वक़्त की कैसी आंधी आई है,
सब कुछ उजड़ता जा रहा है
अब अभिलाषाओं पर नियंत्रण नहीं,
मन कहीं मृगतृष्णा-सा भटक रहा है।

संवेदनाएँ मर रही हैं।
भावनाएँ गुमनाम सी हैं,
पवित्र रिश्तों में भी अब,
स्वार्थ की प्रगाढ़ता
बढ़ती जा रही है।

सुविधाओं की लहरों में,
हर रिश्ता डूब रहा है
पवित्रता का जमीर कहीं,
साधनों की अंधी दौड़ में
हर कोई जीवन का दाँव लगा रहा है।

जीवन की सच्चाई यही है,
ईमान हर कोई बाजार में बेच रहा है॥