सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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भरे रंग पीली सरसों में
यह बसंत है सरसाया,
प्रकृति हुई है रंग-बिरंगी
देखो फिर फागुन आया।
सजी हुई छवि जड़-चेतन की
मन-उमंग भर-भर जाए,
पुष्पित कमल-कली उपवन में
गुन-गुन भँवरे गीत सुनाएँ।
पुलकित अंग-अंग धरती का
ऋतुपति सौरभ बिखराए,
वृक्षों पर नव-कोपल आए
पादप रसाल बौराए।
फसल हुई स्वर्णिम कंचन-सी
फागुन ख़ुशियाँ ले आया,
चंचल मतवाली बयार में
नृत्य मयूर ने दिखलाया।
झाँझ मृदंग ढोल की थापें,
मस्तों की टोली घूमें।
लिए हाथ रंग पिचकारी,
उड़ गुलाल अम्बर चूमे॥