अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
*****************************************
‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ के दौर में इन दिनों शायद सेंसर बोर्ड ने भी देशवासियों की बुद्धि को कृत्रिम ही समझ लिया है, वरना क्या बिसात कि ‘सरके चुनर तेरी सरके’ जैसा द्विअर्थी गीत बाज़ार में आ जाता।
इस गीत में कलाकारों के रूप में नर्तकी नोरा फतेही और अभिनेता संजय दत्त दिखाई देते हैं। इसमें प्रदर्शित कथित अश्लीलता और अभद्रता के आरोपों को लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग ने संज्ञान लेते हुए कलाकारों, लेखक तथा निर्माता को भी नोटिस जारी किया है। आयोग का कहना है कि “पहली नज़र में यह गीत यौन-उत्तेजक और आपत्तिजनक प्रतीत होता है।” यह कदम बताता है, कि मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही सामग्री अब अश्लीलता के परे जाकर सोचे-समझे बिना सार्वजनिक रूप से दिखाई जाने लगी है।
दरअसल, यह विवाद केवल एक गीत तक सीमित नहीं है; यह उस ओछी मानसिकता का संकेत है जिसमें मनोरंजन उद्योग दर्शकों के सामने द्विअर्थी और भड़काऊ सामग्री को चतुराई से ‘कला’ या ‘मनोरंजन’ का नाम देकर परोसता है। ‘सरके चुनर तेरी सरके’ के बोलों में जो संकेत दिख रहा है, वह केवल शब्दों का खेल नहीं है। लेखक ने वासना प्रेरित सोची-समझी रणनीति पर अमल करते हुए काम किया है कि “पहले अश्लीलता को उभारो और फिर अंत में उसे किसी ‘नशीले इत्र’ या ‘मस्ती’ या ‘शराब’ की बात कहकर ढकने की कोशिश करो। दूसरे शब्दों में यह मानो साफ दिखाई देने वाली गंदगी को किसी खुशबूदार परदे के पीछे छिपाए जाने की पटकथा है।
यहाँ सबसे आश्चर्यजनक बात यह है, कि गीत में लेखक ने जिस तरह के इशारे और शब्द प्रयोग किए हैं, वे अंत में शराब या नशे का संदर्भ देकर मानो यह जताने की कोशिश करते हैं कि सब कुछ केवल ‘मस्ती’, ‘प्रेम’ एवं ‘मनोरंजन’ का हिस्सा है, पर वास्तव में यह तर्क उतना ही खोखला है; जितना यह मान लेना कि दर्शक समझने-समझाने की क्षमता से रहित हैं और कुछ भी देख लेते हैं। जब कोई लेखक या रचनाकार यह मानकर सामग्री बनाते हैं कि दर्शक सोचे-समझे बिना सब कुछ स्वीकार कर लेंगे, तो यह केवल कला की गरिमा का ही अपमान नहीं; बल्कि रचियता बनाम समाज की बुद्धिमत्ता का भी अवमूल्यन है।
भारतीय सिनेमा और संगीत की परम्परा पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट है, कि लोकप्रियता पाने के लिए अश्लीलता कभी अनिवार्य नहीं रही। एक समय था जब गीतों में भाव, सौंदर्य और संकेत होते थे, पर वे शालीनता की सीमा को पार नहीं करते थे। आज स्थिति उलटती दिखाई देती है-संकेतों की जगह खुले इशारे, भाव की जगह शोर व सौंदर्य की जगह सनसनी ने ले ली है। इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में केवल निर्माता-निर्देशक ही नहीं, बल्कि नियामक संस्थाओं की ढिलाई को भी क्षमा नहीं किया जा सकता है। सीधा सवाल है कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) की भूमिका क्या और क्यों है, अगर ऐसे गीतों का विरोध जनता एवं संस्थाओं को ही करना है तो! इस संस्था का काम है यह सुनिश्चित करना, कि फिल्मों और गीतों की सामग्री सामाजिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक मर्यादा के अनुरूप हो। यदि ऐसे गीत बिना किसी ठोस आपत्ति के सार्वजनिक मंचों तक पहुँच जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या जाँच-पड़ताल की प्रक्रिया वास्तव में उतनी गंभीर है, जितनी होनी चाहिए ? सेंसर बोर्ड का उद्देश्य कला और रचनात्मकता को दबाना नहीं है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उसकी जिम्मेदारी समाज के प्रति भी है, जो इस बार नहीं निभाई गई।
मनोरंजन उद्योग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात अक्सर की जाती है, और होनी भी चाहिए, किन्तु स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि किसी भी स्तर तक जाकर दर्शकों को उत्तेजना और विवाद का सामान खुलेआम परोस दिया जाए। वैसे भी मनोरंजन को रोकने के लिए किसी माध्यम पर देखने की सीधी मनाही नहीं है, तो ऐसे में अवयस्क वर्ग इसे क्या समझेगा-मनोरंजन या गंदगी, क्योंकि इसे देख-सुनकर ही साफ समझ आ रहा है कि इशारा किधर है ?
वास्तव में लेखन या किसी भी कला की अभिव्यक्ति तब सार्थक होती है, जब वह समाज को समृद्ध करे, सोच को व्यापक बनाए और आमजन की संवेदनशीलता को बढ़ाए। यदि ऐसा कोई काम केवल सस्ती लोकप्रियता के लिए किया जाए, तो वह कला कम और व्यापार ही अधिक होती है।
पूरे विवाद का एक सकारात्मक पक्ष यह है, कि समाज अब चुप रहने को तैयार नहीं है। समीक्षकों सहित जन भावना के आधार पर राष्ट्रीय महिला आयोग का इस पर संज्ञान लेना इस बात का साफ संकेत है कि सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुत सामग्री के प्रति लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए और जिम्मेदारी से काम किया जाना चाहिए। अब इनकी जवाबदेही तय करने की मांग बढ़ रही है, किन्तु भविष्य के मद्देनजर इस मामले में कार्रवाई किसी एक कलाकार या गीत के खिलाफ अभियान जैसी नहीं होना चाहिए, बल्कि बोर्ड और समाज को उस सोच के खिलाफ सख़्ती बरतनी है, जो बार-बार मनोरंजन के नाम पर स्तरहीनता को सामान्य बनाने की कोशिश करती रहती है।
अंततः, सवाल यही है कि हम किस तरह की सांस्कृतिक दिशा की ओर बढ़ना चाहते हैं ? क्या हम मनोरंजन या वापरी जाने वाली वस्तुओं में ऐसी सामग्री को स्वीकार करेंगे- जो संस्कृति, सभ्यता और दर्शकों की समझ का अपमान करे तथा अश्लीलता को मीठी चाशनी के शब्दों में लपेटकर परोस दे ? या फिर यह अपेक्षा करेंगे, कि कला और मनोरंजन समाज के स्तर को ऊपर उठाने का सशक्त माध्यम बने ?
‘सरके चुनर तेरी सरके’ जैसे विवाद केवल एक गीत की बुराई करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह सोचने का है कि मनोरंजन उद्योग और उसके नियामक संस्थानों की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए ? कायदे से तो लेखक संस्था को भी इसमें लेखकों के लिए कुछ नियम जारी करने चाहिए, पर ऐसा होगा नहीं। इसके विपरीत यदि समाज सजग रहेगा और ऐसी प्रवृत्तियों का शांत, मगर दृढ़ विरोध करेगा, तो ही मनोरंजन की दुनिया में गुणवत्ता और मर्यादा का संतुलन बनाए रखना संभव होगा।
कुल मिलाकर अश्लीलता व्यक्त करते इस नृत्य-गीत में साफ दिख रही गंदगी को द्विअर्थी रूप से शराब बताने की फिजूल कोशिश की गई है, जिसका पुरजोर विरोध आवश्यक ही नहीं; आवश्यकता भी है। अन्यथा, ये चलन जाने कहाँ तक देखना पड़ेगा।