पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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हमारे भारतवर्ष में पुरातनकाल से धन की देवी लक्ष्मी, शक्ति की देवी दुर्गा तो विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-आराधना की जाती रही है।
‘यत्र नार्यंतु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः’ यानी जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है।
आज नारी निर्बल नहीं है, वरन् उसका सबल पक्ष देखने को मिल रहा है। वह सहनशील है, तो कार्यकुशल भी है। अब वह किसी के दबाव में झुकने को तैयार नहीं होती है। अंतरिक्ष से लेकर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में अपनी शक्ति और काबिलियत का परचम लहरा रही है।
देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार तो आया है। शिक्षा, राजनीति में लगभग ४४ फीसदी (स्थानीय प्रतिनिधि) और आर्थिक भागीदारी में सुधार हो रहा है, परंतु समाज की पितृसत्तात्मक सोच, वेतन असमानता, कार्यस्थल पर सुरक्षा, घरेलू हिंसा व दहेज आदि की चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं।
सरकार भी महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए अनेक प्रयास कर रही है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम बना कर सरकार ने महिलाओं के हित में बड़ा कदम उठाया है। मोदी सरकार की ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ महिलाओं के लिए एक कामयाब योजना है। ऐसे ही महिला हेल्प लाइन योजना, उज्जवला योजना एवं महिला शक्ति केंद्र आदि अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। यह तो सरकारी योजना एवं प्रयास की बात है, परंतु इन प्रयासों के बावजूद वस्तुस्थिति बिल्कुल अलग है।
आज महिलाएं समाज में घर और बाहर दोनों जगह दोहरी भूमिका निभा रही हैं। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है, जिससे जमीनी स्तर पर नेतृत्व में वृद्धि हुई है। लड़कियों की शिक्षा की पहुँच में काफी सुधार हुआ है। हालांकि, पुरुषों की तुलना में अभी भी कम है। बैंक खातों और डिजिटल सेवाओं तक पहुँच बढ़ने से महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हो रही हैं, परंतु आज भी महिलाओं को लैंगिक असमानता एवं कार्यस्थल पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।
महिलाएं घर-बाहर दोनों जगह की दोहरी जिम्मेदारी के कारण स्वास्थ्य और मानसिक रूप से तनाव की शिकार भी हो रही हैं। पितृसत्तात्मक सोच के कारण महिलाओं को अभी भी बराबरी के लिए सघर्ष करना पड़ रहा है।
महिलाओं के हित की हम चाहे कितनी योजनाएं बना लें, पर अधिकतर महिलाएं (चाहे किसी भी जाति-वर्ग की) आधी ज़िंदगी अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार और भेदभाव आदि की कटुता से उबरने की मानसिक यंत्रणा के साथ गुजरती है। वह शारीरिक मानसिक शोषण को चुपचाप सहन करती है। वह इस खौफ के साये में जीती है, कि दूसरे क्या कहेंगें ? वह हर पल डरती रहती है, कि उसका परिवार टूट जाएगा। इस मानसिक वेदना को सहती हुई वह अपने आँसुओं को चुपचाप पी जाया करती है। गलती ना होते हुए भी परिवार की शांति के लिए वह चुप रहकर दूसरों के गुनाहों को अपने सिर पर ले लेती है। इसका परिणाम यह होता है कि गुनहगार बच जाता है और उसका अत्याचार करने का हौसला बढ़ जाता है। आवश्यकता है, कि महिलाओं के मन से यह डर निकाला जाए, क्योंकि जब तक हम सब डरते रहेंगें, दूसरे हमें डराते रहेंगें। आज हम अपनी आवाज उठाने के लिये अकेले हैं, लेकिन जल्दी ही दूसरे आपके सुर में सुर मिलाने के लिए आगे आ जाएंगें।
नारी तो संसार की सर्वोत्कृष्ट रचना है। वह सृष्टिकर्ता है, वह पालनहार है, इसलिए अपनी शक्ति को पहचानिए। आप किसी से कम नहीं, वरन ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं। हम सबको स्वयं की शक्ति को पहचानने की जरूरत है। महिला तो सृष्टि की जन्मदात्री है, फिर भी समाज स्त्री को दोयम ही समझता है। अब समय आ गया है कि हम बेटियों को आत्मरक्षा का ऐसा प्रशिक्षण दें, कि वह दुर्गा और काली जैसी शक्ति स्वरूपा बन जाएं।
हमें अपने बेटों के मन में भी स्त्री के प्रति आदर-सम्मान की भावना पैदा करनी होगी। यह हम सबकी जिम्मेदारी है। इस अभियान को हम सबको अपने घर परिवार से ही शुरू करना होगा।