नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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‘महावीर जयंती’ विशेष…
जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान जी की जयंती महावीर जयंती के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व श्रद्धालुओं द्वारा मानवता, अहिंसा और आत्मज्ञान के महोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
अहिंसा के पर्याय माने जाने वाले भगवान स्वामी महावीर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर माने जाते हैं। उनका जन्म ईसा से लगभग ५९९ वर्ष पूर्व बिहार के वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। बाल्यावस्था से ही वे बड़े शांत, गंभीर एवं चिंतनशील स्वभाव के थे। इसी कारण से वे ‘महावीर’ कहलाए। वे अपने राजसी जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़े। कठोर तप, ध्यान और संयम के द्वारा उन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त किया। उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई। जैन धर्म में स्वामी महावीर का बहुत बड़ा महत्व है। उन्होंने संसार को सत्य, अहिंसा, करुणा और आत्मसंयम का संदेश दिया। सभी जीव समान हैं, हमें किसी को भी कष्ट नहीं देना चाहिए।
उनका मुख्य उपदेश था : अहिंसा — किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से कष्ट न पहुँचाना। सत्य — हमेशा सत्य बोलना। अस्तेय — जो हमारी वस्तु नहीं है, उसे नहीं लेना। ब्रह्मचर्य — इंद्रियों पर नियंत्रण। अपरिग्रह — भौतिक वस्तुओं का आसक्ति त्यागना।
जैन धर्म में महावीर जयंती एक प्रमुख पर्व है। इस दिन शोभा यात्रा निकाली जाती है तथा उनकी जीवन गाथा का वर्णन किया जाता है। लोग उनके उपदेशों का पालन करने का संकल्प लेते हैं। उन्होंने जीवों और प्रकृति के प्रति दया भाव रखने, आत्म शुद्धि, संयम और पवित्रता का पालन करने को बताया है।
इनका जीवन त्याग, तपस्या और आत्मबल का अद्भुत संगम है। हमें उनसे करुणा, दया, परोपकार, सत्य और अहिंसा का संदेश लेकर अपने जीवन में उतारना चाहिए। सभी के मन में शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए महावीर जयंती का यह पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण है।