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मिलकर रचनी होगी संवेदना की संस्कृति

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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बेटियाँ किसी समाज की संवेदना का दर्पण होती हैं। जहाँ बेटियाँ सुरक्षित, शिक्षित और स्वायत्त हैं-वहाँ सभ्यता की जड़ें गहरी होती हैं, पर विडंबना यह है कि आधुनिक प्रगति के दावों के बीच आज भी अनेक बेटियाँ असमानता, हिंसा और अवसर-वंचना का भार ढो रही हैं। ‘बेटी बचाओ’ जैसे नारे सामाजिक जागरण के प्रतीक हैं, पर वास्तविक परीक्षा नारे से आगे व्यवहार में परिवर्तन की है। मेरी वैचारिकी में शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण और संवेदनशील नागरिकता का शिल्प है। इसी दृष्टि से बेटियों की स्थिति का सत्य खोजा जाए तो स्पष्ट होता है कि समस्या की जड़ केवल आर्थिक नहीं, मानसिक और सांस्कृतिक भी है। घरों में बेटे-बेटी की परवरिश में सूक्ष्म भेदभाव, सपनों की असमान अनुमति, और ‘समायोजन’ की अपेक्षा बेटियों पर अधिक थोप दी जाती है। यह अदृश्य अन्याय आगे चलकर शिक्षा-त्याग, बाल-विवाह और करियर-विघ्न का रूप ले लेता है।
कानूनों की उपलब्धता के बावजूद क्रियान्वयन की कमज़ोरी एक कड़वी सच्चाई है। यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और साइबर अपराध के मामले बढ़ते हुए भी न्याय की गति धीमी रहती है। यहाँ कानून से पहले लोकाचार का जागरण आवश्यक है। परिवार, विद्यालय और मीडिया-तीनों को मिलकर संवेदना की संस्कृति रचनी होगी। विद्यालयों में लैंगिक संवेदनशीलता, सम्मानजनक भाषा और सह-अस्तित्व का अभ्यास उतना ही आवश्यक है, जितना पाठ्यक्रम।
कार्यस्थल पर वेतन-असमानता, काँच की छत और सुरक्षा-चिंताएँ बेटियों की प्रगति को सीमित करती हैं। समाधान के लिए पारदर्शी शिकायत-निवारण, सुरक्षित परिवहन और समान अवसर नीतियाँ अनिवार्य हैं। साथ ही पुरुषों की सहभागिता-घर और कार्यस्थल दोनों जगह-समानता को उपकार नहीं, कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना होगा।
ग्रामीण और वंचित बेटियों के लिए शिक्षा तक पहुँच, पोषण, स्वास्थ्य सेवाएँ और कौशल-प्रशिक्षण निर्णायक कारक हैं। डिजिटल खाई पाटे बिना समान अवसर की बात अधूरी है। छात्रवृत्ति, छात्रावास, और स्थानीय परामर्श-केन्द्र जैसे ठोस कदम बेटियों के जीवन-पथ को बदल सकते हैं।

अंततः सामाजिक क्रान्ति का मापदंड वही है, जिसमें चेतना बदले बिना व्यवस्था नहीं बदलती। जब बेटी का जन्म बोझ नहीं, उत्सव बने; जब उसकी आकांक्षाएँ ‘अनुमति’ की मोहताज न हों; जब सुरक्षा अभियान नहीं, स्वाभाविक संस्कार बने-तभी ‘बेटियों की स्थिति’ का सत्य बदलेगा। साहित्य, शिक्षा और समाज-इन तीनों का संयुक्त अभियान ही बेटियों को न्याय नहीं, न्यायोचित भविष्य देगा।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥