ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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भटक रही हूँ मारी-मारी, तुमको नहीं क्यों खबर हमारी ?
राह है न कोई मंजिल, जाना किधर सुध ले लो हमारी।
दुनिया भर की तुमको चिंता, मेरे लिए क्यों झोली खाली ?
इक नजर हम पर भी डालो, मैं भी तो हूँ ममता की मारी।
जिस डाल पर लोग हैं बैठते, उसी डाल पर मारे कुल्हाड़ी,
मैं-मैं की इस आपाधापी में, भूल ही जाते सब दुनियादारी।
मैं तो हूँ तेरी शरण में, तेरे बिना नहीं मेरी कोई दावेदारी,
आ जाओ तुम पास हमारे, सुधर जाएगी तकदीर हमारी।
तू चाहे तो पार लगा दे, ना चाहे तो सब काम बिगाड़ी,
मुझको मेरी मंजिल बता दो, जिस पर मैं जाऊँ वारी-वारी।
मेरे लिए बस तू ही सहारा, और नहीं है कोई समझदारी,
हर साँस में है बस तेरा नाम, मेरी नहीं कोई और कहानी।
क्यों मैं जाऊँ किसी और द्वारे, तेरे पास ही है मेरी दाना-पानी,
इक बार आकर मुझको बता जा, क्या है अब भूल हमारी।
मैंने दिल से बस तुमको मांगा, और नहीं कोई भी दरबारी।
मेरे दिल में नहीं छल-कपट है, और नहीं कोई राम कहानी॥