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याद ही रह जाती

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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कौन-सी बात कैसी
कब-कहाँ हो जाती है,
कभी सोचा नहीं जो
बात सुनी जाती है।

जैसी चाही थी कभी
देखी न वैसी दुनिया,
छोड़ कर जो गया बस
याद ही रह जाती है।

अपना जब छोड़ कोई
जाता है इस दुनिया से,
कैसे खुद की हँसी
होठों से चली जाती है।

जिसको देखा था अभी
कल तलक हँसते-गाते,
आज मिट्टी वो बने
आह निकल जाती है।

है विधाता वही पर
रचना अलग है उसकी,
जो नदी थी वो समंदर में
चली जाती है।

पूछती हूँ मेरे मालिक,
मुझे बताओ तो।
कैसे मर्ज़ी से तेरे,
हर बात होती जाती है॥