नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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लहू के बदले,
अब बहता
मानव की,
रगों में भ्रष्टाचार।
हर एक सच्चा नर,
हरदम सोचें
क्यूँ हुए सब,
इतने भ्रष्ट।
लहू के बदले,
चाहना ले डूबा
हर इंसान को,
अच्छा-बुरे का भेद मिटाया।
दिल ने मजबूर किया,
इच्छा ने हैवान बनाया
हर इन्सान को पर,
मानव समझ न पाया।
अपनी नियति,
कब क्यूँ और कैसे ?
दिल से मजबूर हुए,
समझ न पाया मन।
मन की कमजोरी ने,
कब डेरा डाला
अपने ही मन पर,
हर हाल में।
मन ने चाहा पूरी करना,
अपनी इच्छा
तब भ्रष्टाचार,
पग-पग पर मिलता जाए।
जीवन में रच-बस जाए,
जैसे वो लहू हो अपना
और मन उसमें डूब जाए।
लहू के बदले अब बहता,
मानव की रगों में भ्रष्टाचार॥