प्रति,
सेवा में,
सचिव (समिति),
संसदीय राजभाषा समिति,
११, तीन मूर्ति मार्ग, नई दिल्ली-११००११
विषय:राजभाषा अधिनियम की धारा ३(३) एवं नियम ११ के योजनाबद्ध उल्लंघन तथा द्विभाषी स्वरूप की त्रुटिपूर्ण व्याख्या के विरुद्ध गंभीर शिकायत।
महोदय,
मैं भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा राजभाषा नीति की निरंतर की जा रही अवहेलना और नागरिकों के साथ भाषाई आधार पर किए जा रहे भेदभाव की ओर संसदीय राजभाषा समिति का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। तथ्यों के साथ विस्तृत विवरण निम्न है:
१. द्विभाषी स्वरूप की विधिक व्याख्या का उल्लंघन:
राजभाषा अधिनियम की धारा ३(३) के अंतर्गत ‘द्विभाषी’ शब्द का अर्थ अत्यंत स्पष्ट है-एक ही प्रलेख में, एक ही समय पर, दोनों भाषाओं (हिन्दी और अंग्रेजी) का समानांतर प्रयोग। विधि के अनुसार हिन्दी और अंग्रेजी का एकसाथ होना अनिवार्य है। किसी प्रलेख को केवल अंग्रेजी में जारी करना और उसका अनुवाद बाद में प्रस्तुत करना या केवल कार्यालय की संचिका (फाइल) में लगा देना अधिनियम का पूर्ण उल्लंघन है। ऐसा अनुवाद ‘द्विभाषी’ की श्रेणी में नहीं आता।
२. भर्ती एवं निविदा प्रक्रियाओं में मनमानी:
वर्तमान में लगभग ९९ प्रतिशत प्रकरणों में भर्ती अधिसूचनाएँ और निविदा प्रपत्र केवल अंग्रेजी में जारी किए जा रहे हैं। मंत्रालयों द्वारा छद्म अनुपालन के रूप में केवल त्रैमासिक रिपोर्ट के आँकड़े भरने हेतु प्रथम पृष्ठ का अनुवाद करवा दिया जाता है, जबकि विस्तृत नियम, शर्तें और पात्रता संबंधी मुख्य प्रपत्र केवल अंग्रेजी में होते हैं। यह अंग्रेजी न जानने वाले अभ्यर्थियों और आपूर्तिकर्ताओं को प्रक्रिया से बाहर रखने का एक षड्यंत्र है। भर्ती एवं निविदा के प्रपत्र वेबसाइटों पर केवल अंग्रेजी में ही अपलोड किए जा रहे हैं।
३. प्रपत्रों की वैधता एवं शून्यता:
चूँकि अधिनियम की धारा ३(३) और राजभाषा नियम ११ के प्रावधान आदेशात्मक हैं, अतः कोई भी अधिसूचना जो केवल अंग्रेजी में जारी की गई है, वह अवैध और शून्य है। अनुवाद को बाद में जारी करना या केवल संचिका में नत्थी करना पूर्वव्यापी प्रभाव से उसे वैध नहीं बना सकता।
४. भ्रामक त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट:
विभागों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली त्रैमासिक रिपोर्टों में अनुपालन के झूठे आँकड़े प्रस्तुत किए जा रहे हैं। धरातल पर केवल अंग्रेजी का प्रयोग हो रहा है, परंतु कागजों पर शत-प्रतिशत अनुपालन दिखाया जाता है। इन आँकड़ों के भौतिक सत्यापन की कोई व्यवस्था न होने के कारण यह भ्रष्टाचार और मनमानी निर्बाध रूप से जारी है।
५. डिजिटल युग में भाषाई भेदभाव:
सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के बाद विभागों ने द्विभाषी की परिभाषा ही बदल दी है, केवल विषय या शीर्षक को हिन्दी में लिखने को द्विभाषी बताया जा रहा है। वेबसाइटें भी द्विभाषी नहीं हैं, हिन्दी के संस्करण का डोमेन अलग होता है और अंग्रेजी का डोमेन अलग होता है। देश की राजभाषा हिन्दी है, पर वेबसाइटों पर प्राथमिकता केवल और केवल अंग्रेजी को दी जाती है। वेबसाइटों पर उपलब्ध प्रपत्रों, फार्मों का द्विभाषी न होना, हिन्दी को प्राथमिकता न देना सीधे तौर पर राजभाषा नीति पर प्रहार है।
६. नियम ५ व नियम ११ का उल्लंघनः
नियम ५ का उल्लंघन लगातार जारी है। हिन्दी में प्राप्त पीजी पोर्टल शिकायतों को बिना समाधान अंग्रेजी में उत्तर लिखकर बंद कर दिया जाता है और आरटीआई आवेदनों को अंग्रेजी में उत्तर लिखकर खारिज किया जाता है, पर इनकी रिपोर्टिंग त्रैमासिक प्रगति रिपोर्टों में कभी भी नहीं की जाती है वहाँ लिखा जाता है, कि हिन्दी में प्राप्त सभी पत्रों का उत्तर हिन्दी में दिया गया। हिन्दी में लिखे जाने वाले ई-मेल के उत्तर राजभाषा विभाग के अतिरिक्त अन्य मंत्रालय व विभाग देते ही नहीं है, क्योंकि हिन्दी में उत्तर देना पड़ेगा।
अब कोई भी मंत्रालय, विभाग, निगम व बैंक आदि अपने छपे फार्म व ऑनलाइन फार्म द्विभाषी रूप में तैयार नहीं करवाते हैं, सभी ग्राहकों व नागरिकों को केवल अंग्रेजी फार्म ही उपलब्ध करवाते हैं। जब कोई ग्राहक या नागरिक माँग करता है तो कहा जाता है कि द्विभाषी (हिन्दी-अंग्रेजी एकसाथ) वाला फार्म तो नहीं है, आपको आवश्यकता है तो हिन्दी वाला फार्म आपको १-२ दिन बाद उपलब्ध करवा दिया जाएगा। पीडीएफ, वर्ड व डिजिटल फार्म भी १०० प्रतिशत अंग्रेजी वाले ही वेबसाइटों पर अपलोड किए गए हैं। अंग्रेजी वेबसाइट पर अंग्रेजी डिजिटल फार्म होता है और हिन्दी पेज पर हिन्दी वाला फार्म जिसमें हिन्दी देवनागरी अक्षरों का प्रयोग करने पर प्रतिबंध होता है। सारे मंत्रालय, विभाग व बैंक आदि मनमानी कर रहे हैं। किसी को भी जनता की सुविधा की चिंता नहीं है और न नियम ११ के अनुपालन की, क्योंकि कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।
वर्ष २००६ में १८ मार्च को लोकार्पित हुए एमसीए २१ से द्विभाषी जारी होने की सभी अनिवार्यताओं को ताक पर रख दिया गया और आज २० वर्ष बाद भी कार्पोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा जारी सभी ई-फार्म, सभी प्रमाण-पत्र व सभी कम्पनी पंजीयन प्रमाण-पत्र केवल अंग्रेजी में जारी किए जा रहे हैं। जनता जिसकी लगातार शिकायतें कर रही है, पर कोई भी सुधार नहीं हुआ। कार्पोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा जारी सभी ई-फार्म, सभी प्रमाण-पत्र व सभी कंपनी पंजीयन प्रमाण-पत्र केवल अंग्रेजी में जारी होने से शून्य व अवैध हैं, पर कोई सुनने वाला नहीं है। आपकी समिति ने भी आज तक इस असंवैधानिक तंत्र पर कोई कार्यवाही नहीं की है।
संसदीय राजभाषा समिति से विनम्र अनुरोध है कि:
सभी मंत्रालयों को नए और स्पष्ट परिपत्र जारी किए जाएँ, जिनमें व्याख्या की जाए कि ‘द्विभाषी’ का अर्थ एक ही समय में एक ही दस्तावेज में दोनों भाषाओं का उपस्थित होना अनिवार्य है।
केवल अंग्रेजी में जारी प्रपत्रों के विरुद्ध प्राप्त जन-शिकायतों पर त्वरित और ठोस कार्यवाही की व्यवस्था की जाए।
ऐसे अधिकारियों को उत्तरदायी ठहराया जाए, जो केवल अंग्रेजी में प्रक्रियाएँ संचालित कर भाषाई भेदभाव को बढ़ावा दे रहे हैं।
केंद्र सरकार की वेबसाइटों पर हिन्दी को डिफॉल्ट भाषा बनाने व ड्रॉप डाउन सूची में व भाषा चयन पृष्ठ पर हिन्दी को प्रथम भाषा के रूप में प्रदर्शित करने का स्पष्ट व बाध्यकारी परिपत्र जारी किया जाए।
त्रैमासिक रिपोर्टों, संबंधित विभाग मंत्रालय की राजभाषा कार्यान्वयन समिति व हिन्दी सलाहकार समिति की बैठकों के कार्यवृत्त आरटीआई की भाँति सभी वेबसाइटों पर अलग स्पष्ट पेज पर अपलोड कर सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाए।
प्रत्येक विभाग व मंत्रालय द्वारा राजभाषा के कार्यान्वयन पर खर्च की गई वार्षिक धनराशि व विवरण भी वेबसाइटों पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
आशा है, कि समिति इस गंभीर विषय पर संज्ञान लेकर राजभाषा हिन्दी के सम्मान और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु ठोस कदम उठाएगी।
भवदीय,
अभिषेक कुमार
रायसेन (मध्यप्रदेश)
(सौजन्य:वैश्विक हिन्दी सम्मेलन, मुम्बई)