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रोज़-डे

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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ललिता अपनी बॉलकनी में खड़ी हुई थी, तभी निगाह अपने घर के सामने रहने वाली धरा के कमरे में पड़ गई। वहाँ आज ‘रोज़-डे’ के अवसर पर शिशिर, धरा को रोज़ का बुके देने के बाद पत्नी को आलिंगनबद्ध करते देख कर वह स्वयं भी अपने प्रियतम से रोज़ के बुके लेकर उनकी बाँहों में लिपटने की कल्पना करती हुई शर्मा गई और वहाँ से हट कर अपने कमरे में आ गई।
उनको अपने पति गौतम पर बहुत गुस्सा आ रहा था। इतनी रोमांटिक कविताएं मंच से सुनाया करते हैं और कहानियाँ लिखते हैं, लेकिन उनके लिए आज तक एक बार भी गुलाब कौन कहे, गेंदे का फूल भी नहीं लेकर आए। धरा को जब से उन्होंने हाथ में बुके पकड़ कर आलिंगनबद्ध देखा था, उनके दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं।
वह मन ही मन सोच बैठी थी, कि आज यदि गौतम गुलाब लेकर नहीं आए तो बस किचन में ताला डाल दूँगीं। क्या समझ रखा है…! वह दिनभर सोचती रही कि गौतम बड़ा-सा रोज़ का बुके लेकर आए हैं और प्यार से उन्हें अपनी बाँहों के घेरे में लिपटा लिया है… वह सज-धज कर गौतम के साथ डिनर पर जा रही हैं… तभी कॉल बेल की आवाज से उनकी तंद्रा टूटी थी। बबीता दीदी बर्तन-झाड़ू करने आई थी, लेकिन उसके जूड़े में लगे हुए गुलाब ने फिर उन्हें रोज़-डे की याद ताजा कर दी थी।
वह उसको टटोलते हुए बोली, “आज बालों में बड़ा गुलाब लगा कर आई है।“
“हाँ दीदी, आज रोज़-डे है न। इन्होंने सुबह-सुबह प्यार से मेरे जूड़े में लगा दिया था।”
अब तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था। वह गौतम के आने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी, लेकिन जब वह गुनगुनाते हुए खाली हाथ घर में घुसे तो उनकी त्यौरी चढ गई और वह पैर पटकते हुए बच्चों के कमरे की ओर बढ़ गई थी। आजकल बच्चों का कमरा उनके लिए कोपभवन बना हुआ था। गौतम उनको उधर की ओर जाते देख कर समझ गए थे कि आज मैडम चंडी रूप में है, बस अब उनकी खैरियत नहीं है। जल्दी ही उनके ऊपर गर्म लहू के थपेड़े जैसे शब्दबाण पड़ने वाले हैं। वह तुरंत समझ गए थे कि वह किसलिए नाराज है। आज सुबह उन्होंने उन्हें याद दिलाया था कि आज रोज़-डे है। लोग पत्नी या प्रेमिका को रोज़ देते हैं। इसलिए उन्होंने तुरंत अपने को संभाल लिया था और प्रेमालाप करते हुए बोले, “मेरी प्रियतमा, वसंत का महीना तो सदा से प्रेम का पर्व रहा है। वसंत का पर्याय कुसुमाकर भी है। हम सब तो सदियों से इस पर्व को मदनोत्सव कहते आए हैं। इस समय विभिन्न रंग-बिरंगे पुष्पों द्वारा प्रकृति अपना श्रृंगार करती दिखाई पड़ती है। आम्र मंजरी की मादक सुगंध रतिपति कामदेव की पदचाप की तरह रति को मदोन्मत्त करती है।
इस मदनोत्सव के मदमाते पर्व पर गुलाब की महक भला कहाँ टिक पाएगी…!“
“बस करिए मेरे लेखक पति, आज आपके यह कोरे डायलॉग्स मुझे जरा भी रुचिकर नहीं लग रहे हैं।“
गौतम ने ठान लिया था, कि वह आज प्रिय पत्नी को खुश करके रहेगा और वह अपनी स्कूटी स्टार्ट करके चला गया ।
ललिता अपनी जीत पर प्रसन्नता के अतिरेक से मुस्कुरा पड़ी थी।
५ मिनट भी नहीं बीते कि पति महाशय हाथ में गोभी का फूल लेकर हाजिर हो गए थे।
“ललिता रानी, मुझे बेचारे गुलाब पर बहुत तरस आ गया। वह मुरझाया हुआ मुँह लटकाए आँसू बहा रहा था और मानो मुझसे कह रहा था, “भला आया ये रोज़-डे… मैं बगीचे में खिला हुआ कितना खुश था। अपने साथियों के साथ खुशी से झूम रहा था, लेकिन अब मेरे भाई बंधु और संगी-साथी इस रोज़-डे की भेंट चढ कर जाने कहाँ गुम हो गए…” मैंने उसके दर्द को महसूस किया और देखो, मैं गोभी का फूल लेकर आया हूँ। आज अपनी प्रियतमा को गोभी के गर्म-गर्म पकौड़े खिला कर रोज डे मनाऊँगा।“

वह अपनी हँसी नहीं रोक पाई और किचन में जाकर गोभी के पकौड़े एवं चटनी बना कर ले आई और फिर उनका रोज़-डे इस तरह से मन गया।