संजीव एस. आहिरे
नाशिक (महाराष्ट्र)
*********************************************
अबकी बार शहतूत का पेड़ झूमकर फूलों से लद गया था। हर टहनी, उपशाखाओं पर फूल ही फूल, ऐसा लग रहा था जैसे शहतूत ने फूलों के गजरे ही गजरे पहन लिए हैं। छोटे-छोटे अनगिनत फूलों ने शहतूत को जैसे लपेट लिया हो। वाह ! शहतूत बसंत का स्वागत करने का तुम्हारा तरीका भी खूब है! मजा आ गया।
एक सप्ताह बाद फिर मेरा गाँव के घर जाना हुआ, तब देखा-शहतूत के फूलों की जगह गुच्छेदार फलों ने ले ली है। हर टहनी फलों से लद गयी है। सब दूर फल ही फल नजर आने लगे हैं। बहुत सारे अभी-अभी पक रहे है, कुछ अधपके तो कुछ फल बिल्कुल पककर काले गुच्छों में परिवर्तित हो गए हैं। टहनियों पर लटके ये सारे गुच्छे बहुत ही मनोरम लग रहे हैं।
दूसरे दिन सुबह उठकर मैंने देखा, शहतूत के पेड़ पर पंछियों का मेला लग रहा है। ओह! कितने तरह-तरह के पंछी उतर आए हैं और बहुत चटखारे लेकर फल खा रहे हैं। नजदीक जाकर थोड़ा गौर से देखा, तीन-चार कोयल बड़ी मस्त होकर गुच्छे खाने में व्यस्त है। ऊपरवाली टहनियों पर करीब पाँच-छह मैना आपस में चहचहाकर खूब रसपान करने में लगी है। उतने में गानेवाले सात भाई का एक बड़ा-सा झुंड आया और पेड़ में विलीन होकर फल खाते हुए गाने लगा। मेरी आहट लगते ही कोयलों ने आसमान नाप लिया; उतने में बुलबुल की एक टोली आयी और टहनियों पर फुदक-फुदककर फलों का रसपान करने लगी। बहुत तन्मयता से सारे पंछी रसपान कर रहे थे। कहीं किसी को किसी से शिकायत नहीं की, कोई होड़ नहीं। सब अपनी-अपनी धुन में, अपने आनंद में कमाल के मेल-जोल से शहतूत के फलों का स्वाद ले रहे थे। मुझे अचानक आदमी की याद हो आयी, कि अगर इन पंछियों की जगह आदमी होते तो सबसे पहले पूरे पेड़ पर अपना ही कब्जा बनाने की कोशिश में जुट जाते। फिर पूरे फल तोड़कर खुद ही समेट लेते। आपस में विवाद, हथियाने की होड़ यहाँ तक, कि तलवारें निकल जाती। आदमी की याद आने पर बहुत अफसोस हुआ मुझे।
कहाँ ये निरीह, निष्पाप, मासूम पंछी सबको साथ रखकर आनंद लेने वाले, जितना जरूरी है उतना ही खाने वाले, मिल-जुलकर आनंद बांटने वाले और प्रकृति का नियम पालने वाले, पर कहाँ अपना आदमी! बहुत देर तक मैं सोचता रहा…।
पंछियों ने शहतूत के पेड़ को आनंद और संगीत का झरना बना दिया था। कितनी-कितनी धुनें शहतूत के पेड़ से निकली जा रही थी। पंछी कितनी तन्मयता से रसपान कर आवश्यक जितना खाकर उड़े जा रहे थे। सारा दृश्य मैं भौचक्का होकर देख ही रहा था कि गिरगिराती हुई 3 कोयल आयी और कलरव करते हुए पेड़ में अदृश्य होकर फल खाने में जुट गई।
यह सारा नजारा देख मुझसे कैसे रहा जा सकता है! मैं अनायास ही शहतूत के नीचे आकर फलों के गुच्छे को तोड़कर खाने लगा। वाह क्या मिठास है! अद्भुत रसास्वादन का अवर्णनीय आनंद! पंछी ने देखा, यह कोई तकलीफदेह आदमी नहीं है, ऐसा भाँपकर अपने काम मे तल्लीन हो गए, तो दो-चार डरकर भाग निकले। बहुत सलीके से कितनी ही देर तक मैं शहतूत का रसपान करके तृप्त होता रहा।प्रकृति का यह रसपूर्ण, मिठास भरा, औषधीय गुणों से लबालब अनमोल तोहफा पाकर प्रकृति को धन्यवाद देता रहा। शाम को शहर की तरफ लौटते वक्त जाने कितनी ही देर मुझे शहतूत की मीठी यादें और पंछियों के अद्भुत मेले की यादें मन पर किसी मयूर पंख की भाँति फिरती रही।
परिचय-संजीव शंकरराव आहिरे का जन्म १५ फरवरी (१९६७) को मांजरे तहसील (मालेगांव, जिला-नाशिक) में हुआ है। महाराष्ट्र राज्य के नाशिक के गोपाल नगर में आपका वर्तमान और स्थाई बसेरा है। हिंदी, मराठी, अंग्रेजी व अहिराणी भाषा जानते हुए एम.एस-सी. (रसायनशास्त्र) एवं एम.बी.ए. (मानव संसाधन) तक शिक्षित हैं। कार्यक्षेत्र में जनसंपर्क अधिकारी (नाशिक) होकर सामाजिक गतिविधि में सिद्धी विनायक मानव कल्याण मिशन में मार्गदर्शक, संस्कार भारती में सदस्य, कुटुंब प्रबोधन गतिविधि में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ विविध विषयों पर सामाजिक व्याख्यान भी देते हैं। इनकी लेखन विधा-हिंदी और मराठी में कविता, गीत व लेख है। विभिन्न रचनाओं का समाचार पत्रों में प्रकाशन होने के साथ ही ‘वनिताओं की फरियादें’ (हिंदी पर्यावरण काव्य संग्रह), ‘सांजवात’ (मराठी काव्य संग्रह), पंचवटी के राम’ (गद्य-पद्य पुस्तक), ‘हृदयांजली ही गोदेसाठी’ (काव्य संग्रह) तथा ‘पल्लवित हुए अरमान’ (काव्य संग्रह) भी आपके नाम हैं। संजीव आहिरे को प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में अभा निबंध स्पर्धा में प्रथम और द्वितीय पुरस्कार, ‘सांजवात’ हेतु राज्य स्तरीय पुरुषोत्तम पुरस्कार, राष्ट्रीय मेदिनी पुरस्कार (पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार), राष्ट्रीय छत्रपति संभाजी साहित्य गौरव पुरस्कार (मराठी साहित्य परिषद), राष्ट्रीय शब्द सम्मान पुरस्कार (केंद्रीय सचिवालय हिंदी साहित्य परिषद), केमिकल रत्न पुरस्कार (औद्योगिक क्षेत्र) व श्रेष्ठ रचनाकार पुरस्कार (राजश्री साहित्य अकादमी) मिले हैं। आपकी विशेष उपलब्धि राष्ट्रीय मेदिनी पुरस्कार, केंद्र सरकार द्वारा विशेष सम्मान, ‘राम दर्शन’ (हिंदी महाकाव्य प्रस्तुति) के लिए महाराष्ट्र सरकार (पर्यटन मंत्रालय) द्वारा विशेष सम्मान तथा रेडियो (तरंग सांगली) पर ‘रामदर्शन’ प्रसारित होना है। प्रकृति के प्रति समाज व नयी पीढ़ी का आत्मीय भाव जगाना, पर्यावरण के प्रति जागरूक करना, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु लेखन-व्याख्यानों से जागृति लाना, भारतीय नदियों से जनमानस का भाव पुनर्स्थापित करना, राष्ट्रीयता की मुख्य धारा बनाना और ‘रामदर्शन’ से परिवार एवं समाज को रिश्तों के प्रति जागरूक बनाना इनकी लेखनी का उद्देश्य है। पसंदीदा हिंदी लेखक प्रेमचंद जी, धर्मवीर भारती हैं तो प्रेरणापुंज स्वप्रेरणा है। श्री आहिरे का जीवन लक्ष्य हिंदी साहित्यकार के रूप में स्थापित होना, ‘रामदर्शन’ का जीवनपर्यंत लेखन तथा शिवाजी महाराज पर हिंदी महाकाव्य का निर्माण करना है।