राधा गोयल
नई दिल्ली
******************************************
संविधान से आम आदमी तक (२६ जनवरी विशेष)….
मेरा मन बहुत उदास है। बहुत दुखी भी है। मन में बहुत क्षोभ और आक्रोश है। न जाने कितनी ही बातें जहन में कौंध रही हैं। हमारे संविधान निर्माताओं ने क्या सोचकर संविधान बनाया था। उस समय यह कहा गया था कि १० वर्ष के लिए आरक्षण दिया जाएगा और हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था, लेकिन मेरा मन यह सोच-सोचकर बहुत दुखी और उदास है कि आजादी के इतने वर्ष बाद भी हिंदी सिर्फ कहने के लिए राजभाषा है। सारा काम अंग्रेजी में ही होता है। उसी समय… आजादी के फौरन बाद हिंदी भाषा में काम करने के लिए प्रेरित किया जाता तो उस समय लोगों में जो जज्बात थे, उससे हिंदी इतनी अधिक प्रगति पर होती कि आज अंतर्राष्ट्रीय भाषा होती, किंतु न मालूम किस दबाव में आकर यह निर्णय नहीं लिया गया। मैकाले की शिक्षा पद्धति का अनुसरण हो रहा है, जो केवल क्लर्क पैदा कर रही है। शिक्षा बिल्कुल संस्कार विहीन होती जा रही है। बस हम कुछ दिनों के लिए बड़ी शान से हिंदी दिवस मनाते हैं।
अब बात आरक्षण की… तो सबको समान अधिकार देने के लिए यह आरक्षण १० वर्ष के लिए लागू किया गया था, किंतु हुआ क्या… जो आरक्षित वर्ग के लोग हैं…. वो हर ३ वर्ष बाद पदोन्नति पा जाते हैं। उनके बेटे-पोते सभी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। विद्यालयों में दाखिले के लिए तो आरक्षण समझ में आता है, लेकिन पदोन्नति में आरक्षण ? इस प्रकार से आपस में वैमनस्य की खाई गहरी होगी या नहीं ? फिर कहते हैं कि सबको बराबर समझो। बराबर कैसे समझें ? गधे और घोड़े को एक समान कैसे समझ लें। और आजकल यही हो रहा है। एक गधे के नीचे घोड़ा काम कर रहा है। सबसे बड़ी बात, कि चिकित्सक बनने के लिए ३९ फीसदी वाले को आरक्षण के तहत दाखिला मिल जाता है और ९८ वाला रह जाता है और उससे भी बड़ी बात…। आरक्षण वाला खुद आरक्षण वाले चिकित्सक से अपना इलाज करवाना पसंद नहीं करता, क्योंकि उसको मालूम है कि उस चिकित्सक की योग्यता कितनी है। जो ३९ फीसदी पर प्रवेश पा गया हो, उसमें कितनी योग्यता हो सकती है? इसकी मिसाल स्पष्ट है, कि हमारे देश के राजनेता भी अपना इलाज करवाने विदेशों में जाते हैं। क्यों जाते हैं ?, क्योंकि उनको मालूम है कि हमारे देश की ज्यादातर प्रतिभा विदेशों में ही काम करती है। हमारे देश में उनको उचित सम्मान नहीं मिलता, इसीलिए वह अपने देश से पलायन करके विदेशों में रहना ज्यादा पसंद करते हैं।
१० साल बाद आरक्षण समाप्त क्यों नहीं किया गया ? अब हालत यह हो गई है कि हर कोई अपने आरक्षण माँग रहा है। जो वाकई भूखे, नंगे, बेबस, लाचार हैं, उनको उन सुविधाओं का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। वंचित, शोषित वर्ग को कोई लाभ नहीं मिल रहा है। जो मलाईदार पदों पर बैठे हैं, उन्हीं के वंशज सदियों से आरक्षण का लाभ ले रहे हैं और इस तरह से असहिष्णुता की खाई को और गहरा कर रहे हैं। ऊपर से एक कानून जो पहले बना हुआ था, कि किसी को एस.सी. और एस.टी. कहने पर फौरन गिरफ्तार कर लो, जिसमें अदालत में संशोधन किया गया, लेकिन केंद्र सरकार ने पलट दिया। किसलिए ?? केवल मतों के लालच में… सत्ता के ‘स्वार्थ’ में…।
सत्ता के लालच में आज तक न जाने क्या कुछ होता रहा है।
तुष्टिकरण की नीति अपनाई जा रही है। जिनके १२-१२ बच्चे हैं, उन्हें छूट दी जा रही है। क्यों नहीं सबके लिए एक जैसा कानून है, कि जिनके ३ बच्चे से ज्यादा हैं, उसे किसी प्रकार की कोई नि:शुल्क सुविधा नहीं दी जाएगी। यह कानून ऐसा है, जो किसी की धार्मिक आस्था पर भी चोट नहीं पहुँचाता। आज तक किसी भी सरकार ने ऐसा कानून बनाने की कोशिश नहीं की।क्यों नहीं की ?
जनसंख्या इतनी विस्फोटक हो गई है कि पर्याप्त संसाधनों की कमी हो गई है। सबके लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर नहीं हैं। सबके लिए रहने को घर, खाने को रोटी और तन ढँकने को वस्त्र नहीं हैं। जब तक जनसंख्या नियंत्रण कानून नहीं बनेगा, तब तक यह संभव नहीं होगा।
सरकार ने कई लोगों को २५-२५ गज जमीन दी थी, जहाँ बेतरतीब तरीके से झुग्गियाँ बनी हुई हैं।यदि २५-२५ गज जगह न देकर हजार गज में १० मंजिला इमारत बनाई जाए, जिसके अंदर बड़ा-सा आँगन हो, जिससे रहवासियों को कोई आयोजन करना हो तो अंदर ही कर सकें और बाहर से दिखने में भी देश में बदहाली का आलम न लगे। उनसे नाममात्र का किराया लिया जाए।मुफ्त में आवास न दिया जाए, बल्कि निर्माण कार्य में भी उन लोगों का सहयोग लिया जाए और पूरी मजदूरी दी जाए। हर प्राणी को दो वक्त की रोटी और पहनने के लिए कपड़े हों। शिक्षा की व्यवस्था हो। कल कारखाने हों।
मंदिरों में इतनी संपदा होती है। सभी मंदिर सौ-सौ गाँवों को गोद लें और उनको विकसित करें। गाँव के लोगों को ही विकास कार्यों में लगाया जाए और पूरी मजदूरी दी जाए। उनके लिए अन्नपूर्णा रसोई बनाई जाए, ताकि अन्य लोगों को भी रोजगार करने का अवसर मिले तो गाँवों से पलायन रुकेगा। खेतों में उगे अनाज को मंडी तक भेजने की जो मजदूरी लगती है,वह भी आधी रह जाएगी, क्योंकि ज्यादा अनाज की खपत अन्नपूर्णा रसोई में ही हो जाएगी।
‘मनरेगा’ योजना के तहत सौ दिन का रोजगार दिया जाता है। सौ दिन के रोजगार से क्या होगा ? बाकी २६५ दिन क्या होगा ? और इस योजना में भी सुना है कि सरपंच अंगूठा लगवा लेते हैं और आधे पैसे देते हैं। सौ दिन काम मिलेगा और आधे ही पैसे मिलेंगे, तो बाकी दिन लोग निकम्मे रहकर क्या करेंगे ? चोरी, डकैती, लूटपाट करेंगे।
जब तक जनसंख्या नियंत्रण के लिये एक जैसा कानून नहीं बनेगा, तब तक सभी योजनाएँ बेमानी हैं।
आवश्यक है कि शोध के विद्यार्थियों के लिए अपने ही देश में पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाएँ, जिससे बाहर के देशों में प्रतिभा पलायन रुके।