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सम्मानित स्त्रीत्व है समाज की वास्तविक परीक्षा

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके ऊँचे भवनों, तकनीकी प्रगति या आर्थिक विकास दर से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे संवेदनशील वर्ग-महिलाओं और बच्चों को कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और अवसरपूर्ण जीवन दे पा रहा है। जब हम परिवार, समाज और राष्ट्र की बात करते हैं, तो उसके केंद्र में स्त्री और बालिका ही होती है। वे ही परिवार की धुरी हैं, वे ही भविष्य की निर्माता हैं। यदि उनका जीवन भय, असुरक्षा, भेदभाव या अवसरहीनता से घिरा है, तो समाज की समृद्धि केवल एक बाहरी आवरण भर रह जाती है।
भारत में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक और विधिक प्रावधान मौजूद हैं। संविधान समानता का अधिकार देता है, जीवन और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। महिलाओं के संरक्षण हेतु घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, दहेज निषेध कानून, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम जैसे विधिक ढाँचे हैं। बच्चों की सुरक्षा के लिए लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो), किशोर न्याय अधिनियम और बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम लागू हैं। कागज़ पर यह व्यवस्था सुदृढ़ प्रतीत होती है, परंतु प्रश्न यह है कि क्या सामाजिक व्यवहार भी उतना ही उत्तरदायी है ?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्टें लगातार यह संकेत देती रही हैं कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की संख्या चिंताजनक स्तर पर बनी हुई है। घरेलू हिंसा, उत्पीड़न, यौन अपराध और अपहरण जैसी घटनाएँ केवल कानूनी आँकड़े नहीं हैं; वे उस सामाजिक सोच का दर्पण हैं जिसमें स्त्री को बराबरी का नागरिक मानने की प्रक्रिया अभी अधूरी है। इसी प्रकार बच्चों के विरुद्ध अपराधों के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की जाती रही है। यह वृद्धि केवल अपराध की संख्या नहीं दर्शाती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि सामाजिक तंत्र-परिवार, विद्यालय, समुदाय-सुरक्षा की पहली दीवार के रूप में अपेक्षित मजबूती नहीं दिखा पा रहे।
महिलाओं की सुरक्षा केवल अपराध दर से नहीं मापी जाती; यह उनके अनुभव से मापी जाती है। यदि एक लड़की सार्वजनिक परिवहन में अकेले सफ़र करने से हिचकती है, यदि एक महिला कार्यस्थल पर अपनी आवाज उठाने से डरती है, यदि परिवार की ‘इज्जत’ के नाम पर पीड़िता को चुप कराया जाता है, तो यह सामाजिक जिम्मेदारी की विफलता है। कानून अपराध के बाद सक्रिय होता है, परंतु जिम्मेदार समाज अपराध होने से पहले रोकथाम का वातावरण बनाता है।
परिवार, जो समाज की मूल इकाई है, वही सबसे पहले मूल्य निर्माण का स्थान है। यदि बाल्यावस्था से ही बेटों-बेटियों के बीच भेद किया जाता है, यदि बेटियों को सीमित आकांक्षाओं का पाठ पढ़ाया जाता है और बेटों को विशेषाधिकार का, तो समानता की शिक्षा अधूरी रह जाती है। सामाजिक संरचना में गहरे बैठे लैंगिक पूर्वाग्रह ही आगे चलकर असमान अवसरों और हिंसा का आधार बनते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण जैसे व्यापक सर्वेक्षणों ने भी यह दर्शाया है कि कई क्षेत्रों में आज भी बाल विवाह, पोषण असमानता और घरेलू हिंसा जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। यह स्थिति संकेत देती है कि सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी है।
बालिकाओं की शिक्षा को लेकर पिछले वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। विद्यालयों में नामांकन दर में सुधार हुआ है, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़ी है, किंतु शिक्षा की निरंतरता अभी भी एक चुनौती है। किशोरावस्था में विद्यालय छोड़ने की समस्या, पोषण की कमी, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता का अभाव और प्रारंभिक विवाह जैसी परिस्थितियाँ बालिकाओं के भविष्य को प्रभावित करती हैं। जब एक बालिका शिक्षा से वंचित होती है, तो केवल उसका व्यक्तिगत विकास नहीं रुकता; समाज की सामूहिक प्रगति भी बाधित होती है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी स्थिति मिश्रित है। मातृ मृत्यु दर में कमी आई है, संस्थागत प्रसव की संख्या बढ़ी है, परंतु ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच अंतर अभी भी स्पष्ट है। पोषण से जुड़ी समस्याएँ, विशेषकर किशोरियों में एनीमिया की उच्च दर, यह दर्शाती है कि परिवारों और समुदायों में पोषण संबंधी प्राथमिकता अभी भी समान रूप से स्थापित नहीं हुई है। जब एक किशोरी कुपोषित रहती है, तो उसका स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य की उत्पादकता-सभी प्रभावित होते हैं।
आर्थिक सशक्तिकरण भी सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा मुद्दा है। महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी दर अपेक्षाकृत कम रही है। बड़ी संख्या में महिलाएँ असंगठित क्षेत्र में कार्य करती हैं, जहाँ सामाजिक सुरक्षा, वेतन समानता और सुरक्षित कार्य वातावरण की गारंटी सीमित होती है। जब समाज महिलाओं के कार्य को ‘पूरक आय’ मानता है, न कि ‘मुख्य योगदान’, तब आर्थिक समानता की दिशा में प्रगति धीमी हो जाती है। स्वयं सहायता समूहों और उद्यमिता कार्यक्रमों ने ग्रामीण क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन दिखाया है, परंतु यह परिवर्तन सार्वभौमिक नहीं है।
डिजिटल युग में एक नई चुनौती उभरकर सामने आई है-ऑनलाइन उत्पीड़न और साइबर अपराध। सोशल मीडिया के विस्तार के साथ महिलाओं और किशोरियों के विरुद्ध डिजिटल माध्यमों में भी अपमानजनक सामग्री, धमकी और ब्लैकमेल जैसी घटनाएँ बढ़ी हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और अन्य कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, पर जागरूकता और त्वरित कार्रवाई अभी भी सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है। एक जिम्मेदार समाज डिजिटल क्षेत्र को भी सुरक्षित बनाता है, क्योंकि आज की पीढ़ी का बड़ा हिस्सा इसी माध्यम से संवाद करता है।
समाज की जिम्मेदारी केवल नीतियों का समर्थन करना नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदारी निभाना भी है। यदि किसी पड़ोस में घरेलू हिंसा की आवाज सुनाई देती है और लोग “यह उनका निजी मामला है” कह कर चुप रह जाते हैं, तो यह सामुदायिक जिम्मेदारी से विमुख होना है। यदि विद्यालय में किसी बच्चे के साथ दुर्व्यवहार की आशंका हो और शिक्षक या अभिभावक संवेदनशीलता न दिखाएँ, तो यह संस्थागत विफलता है। जिम्मेदारी का अर्थ है हस्तक्षेप करना, समर्थन देना और पीड़ित के साथ खड़ा होना।
इसमें मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। संपादकीय लेखन केवल सूचना देना नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को दिशा देना है। जब मीडिया संवेदनशील रिपोर्टिंग करता है, पीड़ित की पहचान की गोपनीयता बनाए रखता है और मुद्दे की संरचनात्मक जड़ों को उजागर करता है, तब वह समाज को जागरूक बनाता है, परंतु जब सनसनीखेज प्रस्तुति होती है, तब समस्या की गंभीरता हल्की पड़ जाती है।
समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए हमें बहुस्तरीय दृष्टिकोण अपनाना होगा। शिक्षा प्रणाली में लैंगिक संवेदनशीलता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा। विद्यालयों में परामर्श सेवाओं को मजबूत करना होगा। स्थानीय प्रशासन को त्वरित शिकायत निवारण तंत्र सुनिश्चित करना होगा। परिवारों को संवाद का वातावरण बनाना होगा, जहाँ बेटियाँ और बेटे समान रूप से अपने विचार रख सकें। धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व को भी समानता और सम्मान के संदेश को सुदृढ़ करना होगा।
यदि हम प्रत्येक स्तर पर-परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल, समुदाय-यह सुनिश्चित करें कि महिलाओं और बच्चों के साथ गरिमा और सुरक्षा का व्यवहार हो, तो अपराध और भेदभाव की जड़ें स्वतः कमजोर पड़ेंगी।
आज आवश्यकता आत्ममंथन की है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि कई क्षेत्रों में हमारी जिम्मेदारी अधूरी है। यह स्वीकार करना सुधार की शुरुआत है। जब समाज अपनी कमजोरियों को पहचानता है और उन्हें दूर करने का संकल्प लेता है, तभी वह सच अर्थों में जिम्मेदार कहलाता है।

अंततः, सुरक्षित बचपन और सम्मानित स्त्रीत्व केवल सामाजिक आदर्श नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की अनिवार्य शर्त है। यदि हम आने वाली पीढ़ियों को भयमुक्त वातावरण, समान अवसर और गरिमापूर्ण जीवन देना चाहते हैं, तो हमें सामूहिक रूप से अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।