ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’
अलवर(राजस्थान)
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“सुनो ! आज तुम जल्दी घर आ जाना। आज हमारी शादी की सालगिरह है। बच्चे कह रहे थे मम्मी आज बाहर खाना खाने चलेंगे।” सुनैना ने झिझकते हुए कहा।
“ओह! मुझे तो मालूम ही नहीं था आज हमारी शादी की सालगिरह है। ठीक है, मैं शाम को जल्दी घर आ जाऊंगा। बच्चों से बोलना वो तैयार रहें।” ये कह कर तुषार ड्यूटी पर चला जाता है।
तुषार एक कम्पनी में काम करता था। उसकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन उसने अपने बच्चों को कभी ये महसूस नहीं होने दिया। वो अपने बच्चों से बहुत प्यार करता था। तुषार की तनख्वाह मात्र १८ हजार ₹ थी। उसमें से अधिकांश पैसे उधारी चुकाने में खर्च हो जाते थे। जैसे-तैसे अपना गुजारा कर रहे थे।
आज शादी की सालगिरह पर बच्चे बड़े खुश थे। छोटा बेटा गोलू बड़ा जिद्दी स्वभाव का था। कहने लगा,-“मैं तो पिज्जा ही खाऊंगा।”
संजू कहने लगी,-“मैं तो चाऊमीन खाऊंगी।” दोनों बच्चे बड़े खुश नजर आ रहे थे।
“अरे! क्यों हल्ला कर रहे हो, खा लेना जिसको जो खाना है।” सुनैना ने प्यार से डांटते हुए कहा।
तुषार आज थोड़ा उदास नज़र आ रहा था। उसका काम में मन नहीं लग रहा था। सोच रहा था कि, कैसे बच्चों की डिमांड पूरी करुंगा। और सुनैना, वो भी तो कुछ इच्छा लेकर बैठी होगी। उसकी इच्छा की पूर्ति करना भी तो मेरा फ़र्ज़ है। आखिर धर्मपत्नी है मेरी, लेकिन कैसे कर पाऊंगा ये सब..! इसी उधेड़बुन में कब समय निकल गया, पता ही नहीं चला। शाम के ४ बजने वाले थे। महीने का आखरी दिन था, बॉस से पगार भी लेनी थी।
बड़ी हिम्मत करके तुषार बोस के कैबिन में जाकर खड़ा हो गया। बॉस बड़ा गुस्सैल और खड़ूस स्वभाव का था। कहने लगा,-“अरे! तुषार तुम यहाँ क्या कर रहे हो! काम नहीं करना है क्या ?”
“सर, आज मुझे घर जल्दी जाना है।”
“क्या! घर जल्दी जाना है! यहाँ काम क्या तुम्हारा पड़ोसी करने आएगा। रोज नए-नए बहाने बनाते हो।” बॉस ने झल्लाते हुए कहा।
तुषार के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई हो। बेचारा खड़ा का खड़ा रह गया। पगार भी मांगे, तो कैसे! कुछ समझ नहीं आ रहा था।
बड़ी हिम्मत करके झिझकते हुए बोला,-“सर मुझे कुछ पैसे चाहिए। आज बच्चों का बाहर खाने का मन हो रहा है।” बॉस को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगा,-“तुम लोग भी बाहर खाना खाते हो। बड़े लोगों की होड़ करने से बड़े नहीं बन जाते।” बॉस ने व्यंग्य कसते हुए कहा।
“सर आज हमारी शादी की सालगिरह है, बच्चों का मन था तो….।” तुषार ने बड़ी विनम्रता से कहा। ये सुनते ही बॉस का गुस्सा आसमान छू गया। “तुम लोग बड़ा बनने की होड़ करते हो। कभी बर्थ- डे मनाते हो, कभी शादी की सालगिरह मनाते हो। अपनी औकात देखते नहीं और बड़े बनने की कोशिश करते हो, शर्म नहीं आती। खैर, मुझे क्या, जाना है तो जाइए लेकिन पगार अभी नहीं मिलेगी। ५ तारीख से पहले किसी को नहीं मिलेगी।” बॉस ने फिर से झल्लाते हुए कहा।
तुषार को जैसे काटो तो खून नहीं। बेचारा अपना-सा मुँह लेकर वापिस आ गया। वो मन ही मन सोचने लगा कि, क्या गरीब होना गुनाह है! क्या गरीब लोग बर्थ-डे नहीं मना सकते! शादी की सालगिरह नहीं मना सकते! कितनी घटिया सोच होती है इन बड़े लोगों की। हम भी इंसान हैं, हमारे अंदर भी भावनाएं होती हैं।
तुषार बड़े दुखी मन से घर लौट रहा था। उसके मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। बच्चे तैयार बैठे होंगे, पत्नी को कैसे मुँह दिखाऊंगा! कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसका सिर चकरा रहा था।
“मम्मी, पापा आ गए।” गोलू ने चिल्लाते हुए कहा। “अरे! आ गए आप, बच्चे कब से आपकी राह देख रहे थे।” सुनैना ने अधिकार भाव से कहा।
“सुनैना, आज मेरा मन नहीं है बाहर खाने का। ऐसा करते हैं आज मीठा भात बना लेते हैं। यहीं बैठ कर सब खा लेंगे।” तुषार ने बड़े दुखी मन से कहा।
सुनैना को कुछ समझ नहीं आ रहा था। कहने लगी,-“ये आप क्या कह रहे हैं! बच्चे सुबह से इंतजार कर रहे हैं। बड़े खुश हो रहे हैं। उनका दिल नहीं टूट जाएगा ? और आप कह रहे हैं कि मूड नहीं है। नहीं नहीं, आज तो हम बाहर होटल का ही खाना खाएंगे।”
“लेकिन सुनैना…!
“नहीं, मैं कुछ नहीं सुनना चाहती। आप हाथ-मुँह धो लीजिए। बच्चे कबसे आपकी राह देख रहे हैं। अगर हम नहीं चलेंगे, तो उनका दिल टूट जाएगा।”
तुषार का दिल रो रहा था। कैसे करूँ, क्या करूँ,… कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर एकाएक उसने निर्णय लिया कि, वह अपने बीवी-बच्चों का दिल नहीं दुखाएगा। वह अपनी बाइक गिरवी रख देगा, लेकिन खाना एक अच्छे होटल में ही खिलाएगा। कहने लगा,-“सुनैना मैं अभी हाथ- मुँह धोकर आता हूँ। तुम भी बच्चों को लेकर तैयार हो जाओ। हम होटल में खाना खाने चलेंगे।” सुनैना मन्द- मन्द मुस्कुराने लगी।
कुछ ही देर में सभी लोग शहर के एक होटल में पहुंच गए। गोलू और संजू ने अपनी पसंद का खाना ऑर्डर किया। तुषार के मन में तरह-तरह के ख्याल आ रहे थे। वो सोच रहा था कि, होटल मालिक को बाइक गिरवी रख दूंगा। ५ तारीख को पगार मिल ही जाएगी, तब बाइक छुड़वा लूंगा।
सभी ने बड़े प्यार से अपनी पसंद का खाना खाया। तुषार की आँखों में अजीब-सा डर था। सोच रहा था कि, कहीं होटल मालिक नहीं माना तो क्या होगा! बच्चों के सामने मैं कभी मुँह नहीं दिखा पाऊंगा।
वो धीरे से होटल मालिक के पास गया और बड़ी विनम्रता से अभिवादन किया। होटल मालिक ने कहा,-“सर और कुछ चाहिए! खाना कैसा बना ?”
तुषार ने हाथ जोड़कर कहा, -“सर खाना बहुत ही स्वादिष्ट बना है, लेकिन एक निवेदन है।”
“बोलिए सर, क्या कहना चाहते हो!” होटल मालिक ने कहा।
तुषार ने हाथ जोड़कर आपबीती सुनाई और कहा,- “सर, आप मेरी बाइक गिरवी रख लीजिए। मैं ५ तारीख को आपके पैसे चुका दुंगा।” होटल मालिक मुस्कुराया और कहने लगा,-“सर आप गेस्ट रूम में आईए, आपकी बीवी और बच्चे आपका इंतजार कर रहे हैं।”
“गेस्ट रूम में, मैं कुछ समझा नहीं!” तुषार को आश्चर्य हो रहा था।
जैसे ही तुषार गेस्ट रूम में प्रवेश करता है, तालियों की गूंज के साथ उसका स्वागत होता है। केक सजा हुआ था। सुनैना मुस्कुरा रही थी। तुषार की आँखों से आँसू छलक आए, कहने लगा,-“सुनैना ये सब तुमने किया है ?”
“हाँ मेरे प्यारे पति जी, ये प्लान मैंने और बच्चों ने पहले ही कर लिया था। ये सरप्राइज है हमारी और से।”
“लेकिन सुनैना, तुम्हारे पास पैसे कहाँ से आए ?” तुषार ने आश्चर्य से पूछा।
“ये सब आप ही के तो हैं। जो मैंने धीरे-धीरे इकट्ठा किए थे।” सुनैना मुस्कुरा रही थी। तुषार की आँखों में आँसू छलक आए।
सुनैना ने कहा,-“आप चिंता मत करिए। आज हमारी शादी की सालगिरह है, खुशियाँ मनाईए। अब थोड़ा मुस्कुरा भी दीजिए। हर बार पति ही अपनी पत्नियों को गिफ्ट देते हैं। क्या पत्नियों का फ़र्ज़ नहीं बनता कि, वो भी अपने पति को गिफ्ट दें।” तुषार की आँखों में आँसू बह निकले। कहने लगा,-“सुनैना मुझे तुम पर गर्व है। जो पैसे मैं तुम्हें खर्चे के लिए देता था, वो पैसे तुमने खर्च नहीं किए और परिवार के लिए जोड़ रखे थे।”
“ओह! सुनैना, तुम कितनी अच्छी हो।” तुषार ने पत्नी को गले से लगा लिया। पूरी होटल में तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही थी।
परिचय- ताराचंद वर्मा का निवास अलवर (राजस्थान) में है। साहित्यिक क्षेत्र में ‘डाबला’ उपनाम से प्रसिद्ध श्री वर्मा पेशे से शिक्षक हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,कविताएं एवं आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप सतत लेखन में सक्रिय हैं।