प्रीति तिवारी कश्मीरा ‘वंदना शिवदासी’
सहारनपुर (उप्र)
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किसी के कारण सुख न पाते जग में तुम।
किसी के कारण दुःख न पाते जग में तुम॥
तुमको तुम्हारे कर्मों का ही फल मिलता,
भोग के उनको मूल्य चुकाते जग में तुम॥
तुमको मानव देह मिली, है छूट तुम्हें,
करो पाप या पुण्य इकट्ठा कर जाओ।
रटो-जपो जी भर के नाम प्रभु जी का,
भटको योनि-योनि या फिर तर जाओ।
ज्ञानवान बन प्रेम से भोग लो कर्मों को,
कर्म-दोष प्रभु को क्यों देते जग में तुम…
भोग के उनको…॥
कर देते संसार में तुम प्रति वस्तु का,
कर्मों का कर प्रभुकोष में होता जमा।
शेष न छोटे से छोटा हिसाब रहता,
पाप कमाया पाप पुण्य तो पुण्य जमा।
पाप-पुण्य के खाते भव में खुले रहें,
बार-बार आते-जाते इस जग में तुम।
भोग के उनको…॥
रात और दिन के चूहे कुतरें उमर तेरी,
माया बंधन कदम-कदम तू मानव है।
काया-माया के बंधन से छूटना हो,
नाम प्रभु का नित जप रे तू मानव है।
कुछ बनना है तो पहले प्रभु भक्त बनो,
हर ऋण मुक्त सदा रहते इस जग में तुम।
भोग के उनको…॥
मन पक्का कर चल दे भक्ति के मारग,
कृपा अवश्य करेंगे दयालु हैं भगवन्।
एक कदम चल पूरी श्रद्धा मन में रख,
शेष कदम चल आएं कृपालु हैं भगवन्।
कर मुझ पर विश्वास स्वयं कहते हैं प्रभु,
शरणागति प्रभु की ना लेते जग में तुम।
भोग के उनको…॥
ले संकल्प प्रभु-भक्ति का जीवन भर,
लख चौरासी जो न भटकना है तुझको।
बन प्रभु भक्त मुक्त होजा हर ऋण से तू,
कर्मों का हर बंध काटना है तुझको।
बस अब के हर हाल मुझे प्रभु को पाना,
इसी भावना से न जीते जग में तुम।
भोग के उनको…॥
किसी के कारण सुख ना पाते जग में तुम।
किसी के कारण दुःख ना पाते जग में तुम॥
तुमको तुम्हारे कर्मों का ही फल मिलता,
भोग के उनको मूल्य चुकाते जग में तुम…॥
