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स्त्रियों की भूमिका पर पुनः शोध की आवश्यकता

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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नारी:संघर्ष, शक्ति, समाज और सफलता….

आज से नहीं, बल्कि वर्षों से महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती आ रही हैं। महिला होती तो शक्तिशाली है, पर वह अपनी शक्ति को पहचानती नहीं और समाज उसका नाजायज फ़ायदा उठाता है; पर अब निरंतर स्थिति कुछ हद तक सुधरती जा रही है। महिलाएँ पहले से अधिक सजग, शक्तिशाली और स्वावलम्बी हो गई हैं। मेरी कविता की कुछ पंक्तियों से बताना चाहूँगी, कि-
“हमारे देश की नारी,
बनी है आज फुलवारी
विजय हर क्षेत्र में पायी,
हम सब अभिमान करते हैं।”
यह निर्विवाद सत्य है, कि सदियों से पुरुष प्रधान समाज की अवहेलना का शिकार रही हैं स्त्रियाँ।इतिहास साक्षी है इस बात का- पाँच पतियों के रहते हुए जिस तरह द्युत-क्रीड़ा में द्रोपदी को हार जाने के बाद दुर्योधन चीर-हरण का व्यूह रचता है और द्रोपदी की रक्षा के लिए कोई पति नहीं आता, यहाँ तक की गंगापुत्र भीष्म भी नहीं। परिणामस्वरूप भरी सभा में द्रोपदी वीरों को ललकारती है।
युद्ध में सबसे अधिक प्रताड़ित स्त्रियाँ ही होती हैं, उन्हीं के साथ बलात्कार, बच्चों की हत्या होती है। ध्यातव्य है, कि जीवनभर विसंगतियों का वरण करने वाली द्रोपदी के पाँच पुत्रों की नृशंसता से हत्या ने उसके भीतर के ममत्व को हिला कर रख दिया। यह तो एक उदाहरण है। इस तरह के अनेक उदाहरण हमारी पौराणिक कथाओं में पढ़े गए हैं, चाहे अहिल्या की बात हो या अनसुइया की, तुलसी की हो या फिर किसी अन्य की। परिणामस्वरूप स्त्री ने पुरुष प्रधान समाज को अपना शत्रु मानना शुरू कर दिया, लेकिन केवल विद्रोह ही विमर्श का एकमात्र पर्याय नहीं होता। आधुनिक स्त्री ने अपने विकास के लिए जिन हथियारों को अपनाया, उनसे भावी समाज को कितनी उपयोगिता हो सकती है, इस पर एक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है।स्त्री मुक्ति ने सफलताओं से अधिक स्त्री को लाचार बना दिया, क्योंकि स्त्री ने विमर्शों के कटघरे में आकर अपनी स्वाभाविकताएँ खो दी हैं।उसे लगने लगा, कि विरोध ही उसके अधिकारों को पाने का एकमात्र ज़रिया है और इस विरोध ने उसके विवेक को विकलांग बना दिया। वैसे देखें, तो आज से पचास वर्ष पूर्व और आज की स्थिति में अंतर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। स्त्री मुक्त तो हुई है और आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर भी, ढेर सारे अवरोध भी पार किए हैं, उसकी उपलब्धियों की अच्छी ख़ासी लम्बी सूची है, लेकिन उतनी ही लंबी सूची उसकी हानियों की भी है। उसने बहुत कुछ पाया, तो बहुत कुछ खोया भी है। और इस खोये हुए की सूची में स्त्री को विरासत में मिले वो गुण भी आते हैं, जो स्त्री को सम्पूर्ण स्त्री बनाती है।
स्त्री ईश्वर की अनुपम सृष्टि मानी जाती है। स्त्री और पुरुष समान नहीं होते, क्योंकि दोनों की अपनी मौलिकताएँ होती हैं। पुरुष के समान होने की लालसा रखना अर्थात् अपने स्वत्व को विसर्जित कर देना है। इतिहास गवाह रहा है, कि परिवार हो-चाहे समाज हो, लड़-झगड़कर या विद्रोह से कुछ हासिल नहीं होता। एक स्त्री के अंदर परिवार को सँवारने और सुचालित करने की अपूर्व क्षमता होती है। संभवतः, भारत विश्व का एकमात्र देश है जहाँ कहा गया है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमंते तत्र देवता।’
आधुनिक समाज में स्त्रियाँ घर और बाहर दोनों दायित्वों को निभा रही हैं, परिवार और समाज को उनसे बहुत सारी अपेक्षाएँ हैं, परन्तु महिलाओं द्वारा की गई कोशिशों के बाद भी उसे अपेक्षित स्थान अभी भी प्राप्त नहीं है। जहाँ तक महिलाओं के सशक्तिकरण का प्रश्न है, तो पिछले चालीस-पचास सालों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में स्त्रियों ने अपना सर्वोत्तम मुकाम हासिल किया है। केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में नाम कमाया है, पर इतनी उपलब्धियों के बाद सफल स्त्रियों की संख्या बहुत कम है। यह भी कटु सत्य है, कि सफल होती स्त्रियाँ दोहरे दंश का शिकार हैं।उसने जितनी ऊँचाई हासिल की है, उस पर अपेक्षाओं की गठरी उतनी ही भारी लदी है। दो पाटों के बीच फँसी हुई महिला का हाल देखिए-
“नारी घर भी देखती, करने जाती काम,
व्यस्त रहे पूरे दिन, कब पाती आराम
ध्यान है रखना उसे सभी का, कुछ ऐसी है सोच,
ज़रा कहीं भी भूल हुई तो पत्नी का ही दोष।”
ऐसी स्थिति में महिला
किंकर्तव्यविमूढ़ होती जा रही है।
पारिवारिक व्यवस्था के अन्तर्गत
भोजन बनाने और सबको पौष्टिक थाली परोसने का काम स्त्रियाँ वर्षों से करती आ रही हैं। वह अन्नपूर्णा कही जाती है, पर उसके खाने के लिए पहले पुरुषों को दिया जाता है।आज भी बहुत से घरों में स्त्रियाँ पुरुषों के खाने के बाद खाती हैं, जबकि खाद्य संसाधनों पर स्त्री- पुरुष दोनों का बराबर अधिकार है।यहाँ समाज की सोच विचारणीय है, जब तक उसमें सुधार नहीं होगा, तब तक समस्या बनी ही रहेगी।यद्यपि, समय के साथ-साथ परिस्थितियों में परिवर्तन हो रहा है।
भारत के संदर्भ में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा में सुधार होना ज़रूरी है। महिलाओं के कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण देने के लिए स्वच्छ सुलभ शौचालय, पानी की सुविधा, सी.सी.टी.वी. कैमरों की व्यवस्था, परिवहन साधनों की सुलभता और सुरक्षा आदि आवश्यक हैं। इसके अतिरिक्त महिलाओं के सुरक्षित और गरिमामयी जीवन-यापन के लिए मातृत्व लाभ, सुरक्षा लाभ, भविष्य निधि तथा पेंशन आदि का लाभ दिया जाना चाहिए।
मातृत्व और बाहर कार्य करना महिलाओं के लिए एक चुनौती भरा काम होता है। इन्हें कुछ समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है जैसे-समय का अभाव, बच्चों की अनियमित आवश्यकताएँ। समाज महिलाओं से अधिकतर यह अपेक्षा रखता है, कि वे घर और कार्यस्थल दोनों में बेहतर प्रदर्शन करें। दोनों को ही पूर्णकालिक भूमिका माना जाता है, जिसमें समय प्रबंधन, भावनात्मक लचीलापन और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच तालमेल बिठाना पड़ता है।

यद्यपि, समाज और सरकार की ओर से स्थिति बेहतर हुई है, पर इस विषय पर पुनः नए शोधों की आवश्यकता है, ताकि स्त्रियों की भूमिका के विषय में फिर से विचार किया जा सके और परिवार, समाज और संस्कृति को बनाए रखने में सहायता मिल सके ।